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पण्डितराज जगन्नाथ — सूक्ति व विचार

पण्डितराज जगन्नाथ के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। पण्डितराज जगन्नाथ के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“दो चार शब्द इधर-उधर से लेकर, कोई व्यक्ति किसी विद्वान से—जिसने संपूर्ण जीवन सरस्वती आराधना में बिताया हो—अगर प्रतिस्पर्धा करने चले, तो यह ऐसी ही अज्ञता होगी जैसे कि साँप, गज एवं सिंह के ललाट पर पैर रखने की मूर्खता, क्रमशः पक्षी, शश तथा सियार करें।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“वानरों की सभा में वृक्षों की शाखाएँ कोमल आसन होती हैं, चीत्कार सुभाषित होता है, एवं दाँतों और नखों से फाड़ना स्वागत सत्कार होता है—यह ठीक ही है।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“दूसरे के पास जाने से; होने वाली अत्यंत चिंता रूप अग्नि की सैकड़ों ज्वालाओं से जिनका अंतःकरण अस्पृष्ट रहता है, ऐसे वे वृक्ष ही अच्छी प्रकार जीते हैं।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“यद्यपि मेघ को किसी वस्तु की इच्छा नहीं है, न ही उसमें स्वतः सामर्थ्य है, न किसी के प्रति विशेष प्रेम है और न किसी के साथ संसर्ग ही, फिर भी अति महान् वह जलद् संत्पत जनों के संताप को मिटाता ही है।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“जिस प्रकार मूषक वस्त्रों को काट कर; अतिगोपनीय गुप्तांगों को भी प्रकट कर देते हैं, उसी प्रकार दुर्जन भी सज्जनों के अतिगोपनीय दोषों को भी उजागर करने का प्रयास कर, उन्हें समाज में दूषित करने के लिए तत्पर होते हैं।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“अच्छे कुल में उत्पन्न; गुणवान् होने पर भी मनुष्य सत्संग के कारण पूजित होता है, क्योंकि अच्छे बाँस से निर्मित तथा तंत्रमुक्त होने पर भी, तुंबीफल से रहित वीणा-दंड महत्त्व को नहीं प्राप्त करता अर्थात् संगीत ध्वनि को नहीं उत्पन्न कर सकता।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“जो परोपकार में संलग्र होने के कारण अपने स्वार्थ का परित्याग करता है, और गुणी व्यक्ति के साथ सदैव अभिन्नता का आचरण करता है, जिसके हृदय से, स्वभाव से ही सुंदर दातृगौरव स्फुरित होता है, जो शक्तिमान् है—ऐसा कोई उत्तम पुरुष सर्वश्रेष्ठ है।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“गुणों से रहित होना ही अच्छा है; गुणों के गौरव को धिक्कार है। क्योंकि और वृक्ष तो विद्यमान रहते हैं, जबकि चंदन के वृक्ष काट डाले जाते हैं।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“महापुरुष विपन्न होने पर भी विलक्षण उदारता दिखलाते हैं। कालागरु अग्नि मे जलने पर भी चारों ओर अलौकिक सुगंध प्रकट करता है।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“पर्वत श्रेष्ठ हैं, उनसे भी पृथ्वी श्रेष्ठ है, उससे भी ब्रह्मांड श्रेष्ठ है और उससे भी अत्यंत श्रेष्ठ महात्मा है—जो प्रलय में भी स्थिर रहते हैं।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“शुभ गुणों से युक्त सज्जन, अति विपत्तिग्रस्त होते हुए भी परोपकार ही करता है।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“रत्न क्या है? निर्मल बुद्धि। शास्त्र क्या है? जिसके श्रवण से द्वैत-ज्ञान रूप अंधकार का उदय नष्ट होता है। सतत उपकार में तत्पर होने वाला मित्र कौन है? कष्ट देने में दक्ष शत्रु कौन है—दुष्ट वासनाओं का समूह।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“सज्जन बिना कहे ही लोक के लिए हितकर आचरणों से संपूर्ण संसार को अत्यधिक आनंदित करता है। चंद्रमा किसके द्वारा प्रार्थना करने पर अपनी शीतल किरणों से कुमुदिनीकुल को विकसित करता है?”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“गुरुजनों की कठोर अक्षरों वाली वाणियों से फटकारे जाने पर भी मनुष्य महत्त्व को प्राप्त करते हैं। बिना खरादी हुई मणियाँ भी राजाओं के मुकुट में कभी धारण नहीं की जाती।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“यश रूपी सुगंध के लिए लशुन की भाँति, शांति रूपी शीतलता के लिए अग्नि-सदृश तथा दया रूप पुष्प के लिए आकाश सदृश, दुर्जन हमेशा सज्जनों को दुःख देता है।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“विद्वानों की विश्वकल्याणकारी मनोवृत्ति अनुपम ही होती है। उनकी उक्त्तियों की रचना कुछ विलक्षण ही होती है। उनका कार्य अलौकिक ही होता है। उनका दर्शनमात्र ही दुःखियों के लिए प्रीतिकर होता है। इस प्रकार उनका सभी क्रियाकलाप वचनों से परे अर्थात् वर्णनातीत होता है।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“जैसे मकड़ी अपने तंतुओं से; शून्य गृहाकाश में तंतु जाल को फैलाती हुई गृह-छिद्रों को शीघ्र ही ढक लेती है, उसी प्रकार सज्जन अपने गुण-समूह से जड़ पुरुष में भी उत्तम गुणों का संचार करता हुआ, उसके दोषों को शीघ्र ही ढकता हुआ सर्वश्रेष्ठ होता है।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“वेदांत में निपुण होने पर भी, दुर्जन सुजनता को नहीं प्राप्त करता। जैसे दीर्घकाल तक सागर में डूबे रहने पर भी, मैनाक पर्वत कोमलता को नहीं प्राप्त करता।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“जो व्यक्ति दुष्टों में साधुता लाने का कार्य करता है, वह मानो आकाश में घर बनाता है, जल में सुंदर चित्र बनाता है और वायु को जल से नहलाता है।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“संसार के रमणीय गुणों की गरिमा से समन्वित, विमल-बुद्धि वाले सज्जनों का क्रोध भी रमणीय हो जाता है। लोगों के लिए आनंदकर सुगंधों से कुमकुम की तीक्ष्णता भी अति रमणीय होती है।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“विद्वानों के मुख से वचन एकाएक नहीं निकलते हैं, यदि निकल गए तो वे इस तरह पीछे नहीं हटते, जैसे हाथियों के दाँत।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“चंदन विषैले सर्पों को धारण करता है। दीपक सिर पर कज्जल को धारण करता है। चंद्रमा भी कलंक को अपनाता है। इस प्रकार राजा दुर्जनों का पोषण करता रहता है, अर्थात् उनको संरक्षण में रखता है।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“बंदर किसी मूर्ख द्वारा गले में पहनाए गए हार को पहले चखता है, फिर सूँघता है और अंत में उसे बटोरकर, नीचे रखकर उसे अपना आसन बना लेता है।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“जैसे समस्त रसायनों में श्रेष्ठ लहसुन; तीक्ष्ण गंध के द्वारा निंदित होता है, वैसे ही असंख्य गुणों से युक्त पदार्थ एक दोष के कारण निंदित हो जाता है।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

“हे चंदन! तुम्हारी सुगंध तीनों लोकों में प्रख्यात है। तुम्हारी शीतलता तो अलौकिक ही है और तुम्हारा यश दिग्-दिगंतों में फैला है, किंतु यह एक बात सुन लो—तुम्हारे खोखलों में विषरुपी ज्वाला को उगलती हुई यह सर्पों की पंक्ति, तुम्हारे सभी सुंदर गुणों को निगल रही है।”

— पण्डितराज जगन्नाथ

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