“जैसे पके फलों को गिरने के अतिरिक्त कोई भय नहीं है, उसी प्रकार जिसने जन्म लिया है, उस मनुष्य को मृत्यु के अतिरिक्त कोई भय नहीं है।”
— वाल्मीकि
विचारघर › संस्कृत व प्राचीन साहित्य › वाल्मीकि
वाल्मीकि के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। वाल्मीकि के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।
“जैसे पके फलों को गिरने के अतिरिक्त कोई भय नहीं है, उसी प्रकार जिसने जन्म लिया है, उस मनुष्य को मृत्यु के अतिरिक्त कोई भय नहीं है।”
— वाल्मीकि
“धर्म से अर्थ प्राप्त होता है। धर्म के सुख का उदय होता है। धर्म से ही मनुष्य सब कुछ पाता है। इस संसार में धर्म ही सार है।”
— वाल्मीकि
“विपत्तिकाल में, पीड़ा के अवसरों पर, युद्धों में, स्वयंवर में, यज्ञ में अथवा विवाह के अवसर पर स्त्रियों का दिखाई देना उनके लिए दोष की बात नहीं है।”
— वाल्मीकि
“मित्र बनना सरल है, मैत्री—पालन दुष्कर है। चित्तों की अस्थिरता के कारण अल्प मतभेद होने पर भी मित्रता टूट जाती है।”
— वाल्मीकि
“यदि गुरु (बड़ा) भी घमंड में आकर कर्त्तव्याकर्त्तव्य का ज्ञान खो बैठे और कुमार्ग पर चलने लगे तो उसे भी दंड देना आवश्यक हो जाता है।”
— वाल्मीकि
“धर्म ही लोक में सर्वश्रेष्ठ है। धर्म में सत्य प्रतिष्ठित है।”
— वाल्मीकि
“दया करना सबसे बड़ा धर्म है।”
— वाल्मीकि
“नीच श्रेणी की स्त्रियों का आचरण देखकर तुम संपूर्ण स्त्री जाति पर ही संदेह करते हो।”
— वाल्मीकि
“निश्चय ही पति नारी के लिए आभूषणों की अपेक्षा भी अधिक शोभा का हेतु है।”
— वाल्मीकि
“धर्म संपूर्ण जगत् को धारण करता है, इसीलिए उसका नाम धर्म है। धर्म ने ही समस्त प्रजा को धारण कर रखा है क्योंकि वही चराचर प्राणियों सहित सारी त्रिलोकी का आधार है।”
— वाल्मीकि
“सुखदायक साधन से सुख के हेतुभूत धर्म की प्राप्ति नहीं होती।”
— वाल्मीकि
“बड़ा भाई, पिता तथा जो विद्या देता है, वह गुरु—ये तीनों धर्म-मार्ग पर स्थित रहने वाले पुरुषों के लिए पिता के तुल्य माननीय हैं।”
— वाल्मीकि
“अपनी शक्ति के अनुसार उत्तम खाद्य पदार्थ देने, अच्छे बिछौने पर सुलाने, उबटन आदि लगाने, सदा प्रिय बोलने तथा पालन-पोषण करने और सर्वदा स्नेहपूर्ण व्यवहार के द्वारा माता-पिता पुत्र के प्रति जो उपकार करते हैं, उसका बदला सरलता से नहीं चुकाया जा सकता।”
— वाल्मीकि
“जिनके हृदय में उत्साह होता है, वे पुरुष कठिन से कठिन कार्य आ पड़ने पर हिम्मत नहीं हारते।”
— वाल्मीकि
“काल का किसी के साथ बंधुत्व, मित्रता अथवा जाति-बिरादरी का संबंध नहीं है। उसे वश में करने का कोई उपाय नहीं है और उस पर किसी का पराक्रम नहीं चल सकता। कारणस्वरूप काल जीव के भी वश में नहीं है।”
— वाल्मीकि
“हे निशाचर! जैसे विषमिश्रित अन्न का परिणाम तुरंत ही भोगना पड़ता है, उसी प्रकार लोक में किए गए पापकर्मों का फल भी शीघ्र ही मिलता है।”
— वाल्मीकि
“जो रात बीत गई है, वह फिर नहीं लौटती, जैसे जल से भरे हुए समुद्र की ओर यमुना जाती ही है, उधर से लौटती नहीं।”
— वाल्मीकि
“जो कर्म के फल का विचार न कर केवल कर्म की ओर दौड़ता हैं, वह उसका फल मिलने के समय उसी प्रकार शोक करता है जैसे ढाक का वृक्ष सींचने वाला करता है।”
— वाल्मीकि
“दिन-रात लगातार बीत रहे हैं और इस संसार में सभी प्राणियों की आयु का उसी प्रकार शीघ्र नाश कर रहे हैं, जैसे सूर्य की किरणें ग्रीष्म ऋतु में जल का शीघ्र नाश करती हैं।”
— वाल्मीकि
“जो कार्य करने से न तो धर्म होता हो और न कीर्ति बढ़ती हो और न अक्षय, यश ही प्राप्त होता हो, उल्टे शरीर को कष्ट होता हो, उस कर्म का अनुष्ठान कौन करेगा?”
— वाल्मीकि
“धनी हो या दरिद्र, दुःखी हो या सुखी, निर्दोष हो या सदोष (जैसा भी हो), मित्र परम गति है।”
— वाल्मीकि
“हे निशाचर! जो लोक-विरोधी कठोर कर्म करने वाला है, उसे सब लोग सामने आए हुए दुष्ट सर्प की भाँति मारते हैं।”
— वाल्मीकि
“झूठ बोलने वाले मनुष्य से सब लोग उसी तरह डरते हैं, जैसे साँप से।”
— वाल्मीकि
“क्षत्रिय युद्ध में मारा जाए तो वह शोक के योग्य नहीं है, यह निश्चित बात है।”
— वाल्मीकि
“अराजक देश में अलंकृत मनुष्य प्रसन्न अश्वों और रथों पर चढ़कर नहीं चल सकते।”
— वाल्मीकि
“जो बल पराक्रम से संपन्न तथा पहले ही उपकार करने वाले कार्यार्थी पुरुषों को आशा देकर पीछे उसे तोड़ देता है, वह संसार के सभी पुरुषों में नीच है।”
— वाल्मीकि
“अराजक देश में शीघ्रगामी वाहन और यानों पर स्त्री-पुरुष वन में घूमने नहीं जा सकते।”
— वाल्मीकि
“वे महान् पुरुष धन्य हैं जो अपने उठे हुए क्रोध को अपनी बुद्धि के द्वारा उसी प्रकार रोक देते हैं, जैसे दीप्त अग्नि को जल से रोक दिया जाता है।”
— वाल्मीकि
“यदि साधु-असाधुओं का पृथक् विभाग करने वाला राजा इस लोक में न होता, तो जैसे दिन अंधकार में विलीन हो जाता है, वैसे ही सब कुछ ताम में डूब जाता।”
— वाल्मीकि
“अराजक देश में शास्त्रविशारद मनुष्य, वनों और उपवनों में शास्त्र की चिंता करते हुए एक दूसरे से नहीं मिलते।”
— वाल्मीकि
“अराजक देश में दूर की यात्रा करने वाले वणिक बहुत सी पण्य-सामग्री लेकर कुशलपूर्वक मार्गों में नहीं चल सकते।”
— वाल्मीकि
“जिनकी जड़ खोखली हो गई हो, वे वृक्ष जैसे अधिक काल तक खड़े नहीं रह सकते, उसी प्रकार पाप कर्म करने वाले लोकनिंदित क्रूर पुरुष ऐश्वर्य को पाकर भी चिरकाल तक उसमें प्रतिष्ठित नहीं रह पाते।”
— वाल्मीकि
“उत्साह ही प्राणियों को सब कामों में सदा प्रवृत्त करता है।”
— वाल्मीकि
“काल भी काल का उल्लंघन नहीं कर सकता। काल कभी क्षीण नहीं होता।”
— वाल्मीकि
“क्रोध प्राणहारी शत्रु है। क्रोध मित्रमुख शत्रु (ऊपर से मित्र किंतु अंदर से शत्रु) है। क्रोध महातीक्ष्ण तलवार है तथा क्रोध सब कुछ को खींच लेता है।”
— वाल्मीकि
“अराजक देश में मनुष्य का कुछ भी अपना नहीं होता। जल में मछलियों के समान मनुष्य एक दूसरे को हड़पने लगते हैं।”
— वाल्मीकि
“पिता की सेवा अथवा उनकी आज्ञा का पालन करने से बढ़कर कोई धर्माचरण नहीं है।”
— वाल्मीकि
“पतिव्रताओं के आँसू इस पृथ्वी पर व्यर्थ नहीं गिरते।”
— वाल्मीकि
“मनस्वी पुरुषों का कहना है कि विजय का मूल अच्छी मंत्रणा है।”
— वाल्मीकि
“जैसे अमृत की संप्राप्ति, जैसे जलहीन स्थान पर वर्षा, जैसे निःसंतान मनुष्य को सदृश पत्नी से पुत्रजन्म, जैसे नष्ट संपत्ति की पुनः प्राप्ति, जैसे हर्ष का अतिरेक, उसी प्रकार मैं आपका आगमन मानता हूँ। हे महामुनि ! आपका स्वागत है।”
— वाल्मीकि
“अराजक देश में जितेंद्रिय पुरुष माला, मिष्ठान और दक्षिणा से देवताओं की पूजा नहीं कर सकते।”
— वाल्मीकि
“अराजक देश में राष्ट्र की वृद्धि करने वाले नट और नर्तकों से युक्त समाज और उत्सव नहीं हो पाते।”
— वाल्मीकि
“स्त्री अथवा पुरुष के लिए क्षमा ही अलंकार है।”
— वाल्मीकि
“इस मानव जीवन और परतंत्रता को धिक्कार है जहाँ अपनी इच्छा के अनुसार प्राणों का परित्याग भी नहीं किया जा सकता।”
— वाल्मीकि
“अराजक देश में साठ वर्ष के जवान हाथी घंटे बाँध कर राजमार्गो पर झूमते हुए नहीं निकलते।”
— वाल्मीकि
“अराजक देश में योग और क्षेम का नाश हो जाता है। अराजक राष्ट्र की सेना शत्रुओं से युद्ध नहीं करती।”
— वाल्मीकि
“शरीर में झुर्रियाँ पड़ गईं, सिर के बाल सफ़ेद हो गए फिर जरावस्था से जीर्ण हुआ मनुष्य कौन सा उपाय करके मृत्यु से बचने में समर्थ हो सकता है?”
— वाल्मीकि
“अराजक देश में धनी लोग, जो कृषि और गोरक्षा से जीविका करते हैं, सुरक्षित रहकर घर के किवाड़ खोल कर नहीं सो सकते।”
— वाल्मीकि
“लोग सूर्योदय होने पर प्रसन्न होते हैं, सूर्यास्त होने पर भी प्रसन्न होते हैं। वे यह नहीं जानते कि प्रतिदिन अपने जीवन का नाश हो रहा है।”
— वाल्मीकि
“जिस प्रकार शरीर के हित-अहित की प्रवर्त्तक आँख है, उसी प्रकार राष्ट्र में जो सत्य और धर्म हैं, उनका प्रवर्त्तक राजा है।”
— वाल्मीकि