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“‘यह सुरक्षित कुसुम ग्रहण करने योग्य है; यह ग्राम्य है, फलतः त्याज्य है; यह गूँथने पर सुंदर लगेगा; इसका यह उपयुक्त स्थान है और इसका यह’—इस प्रकार जैसे पुष्पों को भली-भाँति पहचानकर माली माला का निर्माण करता है, उसी प्रकार सजग बुद्धि से काव्यों में शब्दों का विन्यास करना चाहिए।”
“व्याकरण रूपी सागर के सूत्र जल हैं, वार्तिक आवर्त्त (भँवर) हैं, पारायण (भाष्य, कौमुदी आदि) रसातल हैं, धातुपाठ, उणादि, गणपाठ आदि ग्राह हैं। (उस व्याकरण रूपी सागर) को पार करने के लिए चिंतन-मनन विशाल नाव है। धीर व्यक्ति उसके तट को लक्ष्य बनाते हैं और बुद्धिहीन व्यक्ति उसकी निंदा करते हैं। समस्त अन्य विद्या रूपी हथिनियाँ उसका निरंतर उपभोग करती हैं। इस दुरवगाह्य व्याकरण रूपी सागर को बिना पार किए कोई व्यक्ति शब्द रूपी रत्न तक पहुँचने में समर्थ नहीं हो पाता।”
“दिवंगत होने पर भी सत्काव्यों के रचयिताओं का रम्य काव्य-शरीर; निर्विकार ही रहता है और जब तक उस कवि की अमिट कीर्ति पृथ्वी और आकाश में व्याप्त है, तब तक वह पुणयात्मा देव-पद को अलंकृत करता है।”
“इष्टकार्य को करने की स्वीकृति या संकल्प को प्रतिज्ञा कहते हैं। धर्म, अर्थ, काम और कोप के आश्रित होने से वह प्रतिज्ञा चार प्रकार की होती है : धर्ममूलक प्रतिज्ञा, अर्थमूलक प्रतिज्ञा, काममूलक प्रतिज्ञा और कोपमूलक प्रतिज्ञा।”
“गुरु के उपदेश से तो मंदबुद्धि व्यक्ति भी शास्त्रों का अध्ययन कर सकते हैं, लेकिन काव्य तो किसी प्रतिभाशाली को कभी-कभी ही (सदा-सर्वदा नहीं) स्फुरित होता है।”
“माधुर्य और प्रसाद गुण चाहने वाले सुधी कवि, अधिक समस्त (समासयुक्त) पदों का प्रयोग नहीं करते। कुछ कवि जिन्हें ओज की अभिव्यक्ति ही वांछित है, अत्यधिक समस्त पदों का प्रयोग करते हैं। उदाहरणार्थ ‘मंदारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका’ अर्थात मंदार वृक्ष के पराग से पीली अलकों वाली नायिका।”
“शब्द और अर्थ दोनों मिलकर ही काव्य कहलाते हैं। यह काव्य दो प्रकार का होता है : गद्य और पद्य। संस्कृत, प्राकृत और इनसे भिन्न अपभ्रंश—भाषा के आधार पर यह तीन प्रकार का होता है।”
“अनुप्रास अनेक अर्थों वाले होने चाहिए, लेकिन उनके अक्षर भिन्न नहीं होने चाहिए, अर्थात् समान ही होने चाहिए। इस मध्यम युक्ति (मार्ग) से कवियों की वाणी रम्य बनती है।”
“धर्मशास्त्रों तथा उनके द्वारा स्थापित मर्यादा को आगम कहते हैं। उन धर्मशास्त्रों तथा उनके द्वारा स्थापित लोकमर्यादा के आचरण के अतिक्रमण से आगमविरोधी दोष होता है।”
“हे धैर्यशील! रमणीय भोगों में भी तुम्हारी बुद्धि आसक्त्त नहीं होती। ये रमणियों से संबद्ध भोग (ऐंद्रिक आनंद) मुनियों का भी मन हर लेते हैं, अर्थात् उन्हें भी साधना—पथ से विमुख कर देते हैं, लेकिन तुम उनमें भी नहीं रमते।”
“जो प्रतिज्ञा प्रत्यक्ष प्रमाण से ही बाधित हो, अर्थात् प्रत्यक्ष प्रमाण से ही अयथार्थ (असत्य) सिद्ध हो जाए, उसे प्रत्यक्षबाधिनी प्रतिज्ञा कहते हैं। यथा, अग्नि शीतल है, रूप का अस्तित्व नहीं है, चंद्रमा उष्ण है।”
“काव्यप्रणयन के लिए व्याकरणशास्त्र, छंदःशास्त्र, शब्दकोश, व्युत्पत्ति-शास्त्र, ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथाओं, लोकव्यवहार, तर्कशास्त्र और कलाओं का मनन करना चाहिए।”
“न वह शब्द है, न अर्थ, न न्याय और न कला ही, जो काव्य का अंग न बन सके, अर्थात् काव्य में सभी शब्दों, अर्थों, दर्शनों, कलाओं आदि का प्रयोग हो सकता है। अहो! कवि का दायित्व कितना बड़ा है।”
“जिसके शब्द लोकप्रसिद्ध (लोकप्रचलित) हो; पदों की संधियाँ भली प्रकार से मिली हुई हों; जो ओजस्वी, प्रसाद गुणसंपन्न तथा सहज उच्चार्य हो, वही विदग्ध कवियों का वांछित यमक है, अर्थात् विद्वान ऐसे यमक की ही प्रशंसा करते हैं।”
“शब्द का फल है अर्थज्ञान और एक शब्द के दो फल नहीं हो सकते। आपके चिंतन में एक ही शब्द से दो फल—तद्भिन्न की निवृत्ति और तत्पदार्थ का ज्ञान—कैसे प्राप्त होते हैं?”
“कवि को अपनी शक्ति (शब्दज्ञान एवं शास्त्रज्ञान) से ही काव्यप्रणयन में प्रवृत्त होना चाहिए। दूसरों के काव्य पर निर्भर करने वाले व्यक्ति तो उनके कथन का अनुवादमात्र करते हैं।”
“जिससे अर्थ की प्रतीति हो, वह शब्द है— ऐसा कुछ विद्वान मानते हैं। ऐसी स्थिति में तो अग्नि की प्रतीति कराने के कारण धूम्र और प्रकाश को भी शब्द मानना पड़ेगा।”
“सिद्धांत है कि किसी वस्तु का ज्ञान, उस वस्तु से ही संभव है। अतएव रूप की उत्पत्ति भी उस वस्तु से ही माननी होगी, अन्यथा घट का ज्ञान अन्य वस्तु के द्वारा अभिहित होगा।”
“शब्दालंकार शब्द के शोभाधायक होते हैं और अर्थालंकार अर्थ के। चूँकि शब्द और अर्थ दोनों मिलकर ही काव्य होते हैं, इसलिए हमें तो शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों ही इष्ट हैं।”
“जिसके शब्द अन्य कवि के शब्द प्रयोगों पर निर्भर हों, अर्थात् जिस रचना में शब्दयोजना पूर्ववर्ती कवियों से उदाहृत हो, ऐसा काव्य सरस होने पर भी विद्वानों को उसी प्रकार आनंदित नहीं करता, जिस प्रकार दूसरों द्वारा धारण करके उतार दी गई सरस माला सहृदयों को आकर्षित नहीं करती।”
“जिस देश में किसी द्रव्य की जैसी उत्पत्ति कही गई है, अथवा नहीं कही गई है, उसके स्वभाव को ध्यान में रखकर, उसके विपरीत वर्णन को देशविरोधी दोष कहा गया है।”