विचारघर

विचारघर › संस्कृत व प्राचीन साहित्य › बाणभट्ट

बाणभट्ट — सूक्ति व विचार

बाणभट्ट के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। बाणभट्ट के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“सहस्रों माता-पिता और सैकड़ों पुत्र व पत्नियाँ युग-युग में हुए। सदैव के लिए वे किसके हुए और आप किसके हैं?”

— बाणभट्ट

“बड़े लोगों की बुद्धि स्वभाव से ही स्वतंत्र और अपनी रुचि के अनुरोध पर चलने वाली होती है।”

— बाणभट्ट

“दानव हो या मानव, मुनि हो या भोले-भाले शंकर, भी सुरलोक की सुंदरियों को कटाक्ष-शृंखला से वह बंध ही जाएगा।”

— बाणभट्ट

“धार्मिक पुरुषों के पास कल्याण संपदाएँ सदैव रहती है।”

— बाणभट्ट

“धन-संपत्ति मिथ्या अभिमान से उन्मत्त कर देती है।”

— बाणभट्ट

“इस सुंदरी का शरीर मनोहर है, वाणी रम्य है तथा चरण-निक्षेप अलौकिक है।”

— बाणभट्ट

“महापुरुषों के गुण क्षुद्र लोगों के नीरस और निष्ठुर मनों को भी इस प्रकार खींच लेते हैं जैसे चुंबक लोहे को, फिर जो स्वभाव से ही सरस और कोमल स्वभाव के लोग हैं, उनकी तो बात ही क्या?”

— बाणभट्ट

“समस्त प्राणियों को खा जाने वाले मृत्युदेव की भूख कभी नहीं बुझती। अनित्यता रूपी नदी अत्यंत तेज़ी से बह रही है। पंचमहाभूतों की गोष्ठियाँ क्षणिक हैं।”

— बाणभट्ट

“विद्वान, विवेचक, बलवान, कुलीन, धैर्यवान, और उद्योगी मनुष्य को भी यह दुष्ट लक्ष्मी दुर्जन बना देती है।”

— बाणभट्ट

“मनस्विता धन की गर्मी से लता के समान झुलस जाती है।”

— बाणभट्ट

“महापुरुषों में ही इस तरह उदारता की अधिकता होती है जो अन्य लोगों में नहीं होतीं और जिससे वे त्रिभुवन को अपने वश में कर लेते हैं।”

— बाणभट्ट

“प्रायः अबलाओं के जीवित रहने का अवलंबन पति होता है या संतान।”

— बाणभट्ट

“यौवनकाल में रजोगुण-वश उत्पन्न भ्रांति वाला स्वभाव मनुष्य को इच्छानुसार बहुत दूर इसी प्रकार ले जाता है जिस प्रकार प्रबल वायु सूखे पत्तों को।”

— बाणभट्ट

“ऐश्वर्य के अनुरूप ही मनुष्य की चित्तवृत्तियाँ होती हैं।”

— बाणभट्ट

“छोटी प्रकृति के लोग संपत्ति के कण को भी पाकर तराज़ू के समान ऊपर को उठ जाते हैं।”

— बाणभट्ट

“बिना किसी के गुण-दोष की ओर ध्यान दिए परोपकार करना सज्जनों का एक व्यसन ही होता है।”

— बाणभट्ट

“समस्त संसार को संतप्त कर देने में समर्थ सूर्य के तेज (की किरणें) त्रिभुवन के नेत्र को आनंदित करने वाले पद्म-समूह में आकर ठंडे पड़ जाते हैं।”

— बाणभट्ट

“जब पूर्वजन्म के बलवान शुभ या अशुभ कर्म आगे-पीछे फल देने वाले हैं ही तो बुद्धिमान को शोक करने का क्या अवसर है?”

— बाणभट्ट

“कुलीन लोग स्नेह से व्याकुल होकर भी देशकाल के अनुरूप आचार का अभिनंदन करते हैं।”

— बाणभट्ट

“क्रोध से कलुषित बुद्धि कर्तव्य-अकर्तव्य का विचार नहीं करती।”

— बाणभट्ट

“अत्यंत कष्ट की दशा में भी प्राणियों की प्रवृत्तियाँ जीवन की आशा का परित्याग नहीं कर पातीं।”

— बाणभट्ट

“पूर्व-जन्म में प्राणी जो कर्म करता है, वही उसके इस जन्म में फल देता रहता है।”

— बाणभट्ट

“चंद्रमा का उचित स्थान आकाश ही है, पृथ्वी नहीं।”

— बाणभट्ट

“निरंतर परिवर्तित होता हुआ यह काल अनेक महापुरुषों को भी एक साथ अनादरपूर्वक गिरा देता है जैसे बड़े-बड़े पर्वतों की शेषनाग।”

— बाणभट्ट

“जो जितेंद्रिय नहीं हैं, उनके नेत्र उच्छृंखल इंद्रिय रूपी अश्वों द्वारा उठी धूल से भर जाते हैं।”

— बाणभट्ट

“बुद्धिमान लोग अपनी विशुद्ध बुद्धि से समस्त भली बुरी बातों को देख लेते हैं।”

— बाणभट्ट

“इस विशाल त्रिभुवन में ऐसा कोई प्राणी नहीं हुआ जो कामदेव के बाण का लक्ष्य हुआ नहीं है, होता नहीं है या होगा ही नहीं।”

— बाणभट्ट

“अत्यंत क्रोधी स्वभाव का नेत्रधारी भी अंधा ही होता है।”

— बाणभट्ट

“जो चित्त सदा ही मित्र के दुःख से दुखित है उसको सुख की आशा कैसी? शांति कैसी?”

— बाणभट्ट

“कुपित व्यक्ति की पहले विद्या धुँधली हो जाती है और बाद में भृकुटि।”

— बाणभट्ट

“प्रथम दर्शन में ही सज्जन व्यक्ति उपहार के रूप में प्रणय को समर्पित करता है।”

— बाणभट्ट

“नवीन विषय, ग्राम्यदोष का अभाव, स्वाभाविक सुंदर जाति (वर्णन-शैली), सरल श्लेष, स्फुट रस प्रतीति, गंभीर पदावली इन सबका किसी काव्य में एकत्र प्रयोग दुर्लभ होता है।”

— बाणभट्ट

“आत्मकृत दोषों का फल निश्चित ही स्वयं ही भोगना पड़ता है।”

— बाणभट्ट

“तेजस्वी लोग तड़ित के समान आघात पाकर जल में भी प्रज्वलित रहते हैं।”

— बाणभट्ट

“स्फटिक मणि के समान मन के निर्मल होने पर गुरु के उपदेश-गुण चंद्रकिरणों की भाँति सरलता से प्रवेश करते हैं।”

— बाणभट्ट

“यौवन से उत्पन्न अति गहन अंधकार न तो सूर्य द्वारा भेद्य है, न रत्नों के आलोक से छेद्य है और न दीप की प्रभा से दूर किया जा सकता है।”

— बाणभट्ट

“विधाता के संसार में सृष्टि के उत्कृष्ट परंतु अदृष्टपूर्ण दृश्य अत्यंत धीर लोगों को भी आश्चर्यचकित कर देते हैं।”

— बाणभट्ट

“गुरु का उपदेश निर्मल होने पर भी असाधु पुरुष के कान में जाने पर उसी प्रकार दर्द उत्पन्न करता है जैसे जल।”

— बाणभट्ट

“यौवन का आरंभ होते ही कन्याओं के पिता संताप-अग्नि के ईंधन बन जाते हैं।”

— बाणभट्ट

“जैसे छोटा अंकुश भी हाथियों पर गिरकर उन्हें कष्ट देता है, वैसे ही बड़ों के ऊपर थोड़ा क्लेश पड़ना भी बहुत कष्टकर होता है।”

— बाणभट्ट

“अनुभव हो जाने पर क्या शंका हो सकती है।”

— बाणभट्ट

“अकारण शत्रुता करने वाले उन भयंकर दुष्टों से कौन नहीं भयभीत होगा जिनके मुख अत्यंत विषैले सर्पों के विष-भरे मुखों के समान सदा ही दुर्वचनों से भरे रहते हैं।”

— बाणभट्ट

“बड़े लोगों के मन में जिन वस्तुओं की अभिलाषा उत्पन्न होती है, भाग्य उन्हें उपस्थित करने में देर नहीं लगाता मानो वह भी पहले से उनकी सेवा करता रहता है।”

— बाणभट्ट

“करुणाहीन लोगों के लिए क्या करना कठिन है?”

— बाणभट्ट

“यौवन के आरंभ में मनुष्यों की बुद्धि शास्त्ररूपी जल से धुल जाने के कारण निर्मल होने पर भी प्रायः कलुषता को प्राप्त हो जाती है।”

— बाणभट्ट

“लोगों का कहना है कि दूसरों की प्राण-रक्षा से बढ़कर संसार में कोई पुण्य नहीं है।”

— बाणभट्ट

“प्राण देकर भी मित्र के प्राण की रक्षा करनी चाहिए।”

— बाणभट्ट

“सभी प्राणियों के लिए इस संसार में जीवन से अधिक प्रिय अन्य कोई वस्तु नहीं है।”

— बाणभट्ट

“प्रायः महान प्राणियों का भी तेज अखंड अपराजय होता है।”

— बाणभट्ट

“कामदेव के बाण पहले तो विनय आदि को तोड़ते हैं, फिर मर्मस्थानों को।”

— बाणभट्ट

संस्कृत व प्राचीन साहित्य के अन्य रचनाकार