विचारघर

विचारघर › संस्कृत व प्राचीन साहित्य › कालिदास

कालिदास — सूक्ति व विचार

कालिदास के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। कालिदास के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“अज्ञानवश डोंगी से सागर पार करने की इच्छा कर रहा हूँ।”

— कालिदास

“स्त्रियों में जो मनुष्य जाति से भिन्न स्त्रियाँ हैं, उनमें भी बिना शिक्षा के ही चतुरता देखी जाती है, जो ज्ञान संपन्न है, उनका तो कहना ही क्या! कोयल आकाश में उड़ने की सामर्थ्य होने तक अपने बच्चों का अन्य पक्षियों से पालन करवाती है।”

— कालिदास

“वस्तुतः स्त्रियों को अपने इष्ट व्यक्ति (प्रियतम) के प्रवास से उत्पन्न दुःख अत्यंत असह्य होते हैं।”

— कालिदास

“निर्मल चंद्रमा पर पड़ी पृथ्वी की छाया को लोग चंद्रमा का कलंक कहकर उसे बदनाम करते हैं।”

— कालिदास

“चोरी के माल के साथ पकड़ा हुआ चोर अब कह ही क्या सकता है?”

— कालिदास

“जब कोई पराक्रमी अपने बल से अपने शत्रुओं को जीत लेता है तो उसका प्रणाम भी उसकी कीर्ति ही बढ़ाता है।”

— कालिदास

“भिन्न-भिन्न रुचि वाले लोगों के लिए प्रायः नाटक ही एक ऐसा उत्सव है जिसमें सबको एक-सा आनंद मिलता है।”

— कालिदास

“समुद्र के समान वह प्रतिक्षण मेरे नेत्रों को क्षण-क्षण में नया-नया-सा दिखाई पड़ रहा है।”

— कालिदास

“प्रिय जनों में बँटा हुआ दुःख सह्य हो जाता है।”

— कालिदास

“स्त्रियाँ प्रत्युत्पन्नमति होती हैं।”

— कालिदास

“स्त्रियों का शृंगार प्रिय के देखने पर ही सफल होता है।”

— कालिदास

“दुष्ट व्यक्ति प्रत्यपकार से ही शांत होता है, उपकार से नहीं।”

— कालिदास

“अपने सामने बंधुजनों को देखकर दुःख का द्वार खुल-सा जाता है।”

— कालिदास

“जैसी होनी होती है, वैसी ही बुद्धि व इंद्रियाँ भी हो जाती हैं।”

— कालिदास

“धर्म की रक्षा के लिए ही विष्णु संसार में अवतार लेते हैं।”

— कालिदास

“व्यर्थ कार्यों के लिए प्रयत्न करने वाले कौन व्यक्ति सचमुच तिरस्कार के पात्र नहीं होते?”

— कालिदास

“मित्रों का काम पूरा करने के लिए सन्नद्ध लोग कभी अपनी गति मंद नहीं करते।”

— कालिदास

“छोटे लोग भी पहले के उपकार का ध्यान करके मित्र के आश्रय के लिए आने पर विमुख नहीं होते—फिर ऊँचे लोगों का तो कहना ही क्या।”

— कालिदास

“हमारे जैसे लोगों को एकांत विध्वंसशील (नश्वर) इस शरीर के प्रति मोह नहीं होता।”

— कालिदास

“अकेला व्यक्ति यदि सर्वज्ञ भी हो तो भी उसके निर्णय में दोष हो ही सकता है।”

— कालिदास

“ईंधन से जलाई गई अग्नि कृषि योग्य पृथ्वी को जला भले ही देती है, किंतु उसे इस योग्य अवश्य कर देती है कि बीजों में अंकुर उपजा सके।”

— कालिदास

“जैसे बीच में विषम शिलाओं के आ जाने से नदी का वेग बढ़ जाता है वैसे ही अपने प्रिय से मिलने के सुख में बाधाएँ आ जाती हैं तो प्रेम सोगुना हो जाता है।”

— कालिदास

“महात्माओं की वाणी कभी भी संसार में मिथ्या नहीं होती।”

— कालिदास

“विष-वृक्ष को भी स्वयं बढ़ाकर अपने ही हाथ से काटना ठीक नहीं।”

— कालिदास

“सज्जन लोगों का याचकों के प्रति अभिलषित वस्तु को करके दिखाना ही उत्तर होता है।”

— कालिदास

“महापुरुषों के क्रोध को शांत करने का उपाय उनकी शरण में चले जाना है।”

— कालिदास

“सज्जनों का लेना भी देने के लिए ही होता है जैसे बादलों का।”

— कालिदास

“उत्कृष्ट शिष्य को दी गई शिक्षक की कला अधिक गुणवती है जैसे मेघ का जल समुद्र की सीपी में पड़ने पर मोती बन जाता है।”

— कालिदास

“स्त्री के प्रति पुरुष का प्रेम चंचल होता हैं, परंतु मित्र के प्रति प्रेम चंचल नहीं होता।”

— कालिदास

“अग्नि लकड़ियों को हिला देने से प्रज्वलित हो जाती है। साँप छेड़ने पर अपना फन फैलाता है। इसी प्रकार मनुष्य भी प्रायः क्षोभ से अपने पराक्रम को प्राप्त होता है।”

— कालिदास

“औषधि तभी काम करती है, जब आयु शेष हो।”

— कालिदास

“स्त्रियाँ स्वभाव से ही चतुर होती हैं।”

— कालिदास

“पुराना होने से ही सब कुछ श्रेष्ठ नहीं हो जाता और न काव्य इसलिए बुरा होता है कि वह नया है। बुद्धिमान लोग दोनों के परखने के उपरांत ही जो अच्छा होता है, उसे अपना लेते हैं। मूढ़ लोग ही दूसरों के विश्वासों के अनुसार अपनी बुद्धि बना लेते हैं।”

— कालिदास

“पिंड खजूर से अरुचि उत्पन्न हुए व्यक्ति को इमली की इच्छा होती है।”

— कालिदास

“प्रायः समान विद्या वाले लोग एक-दूसरे के यश से ईर्ष्या करते हैं।”

— कालिदास

“अग्नि की महिमा इसी में मानी जाती है कि वह समुद्र में भी वैसे ही प्रज्वलित हो जैसे सूखी घास में।”

— कालिदास

“तेजस्वियों की आयु नहीं देखी जाती।”

— कालिदास

“यदि कोई पति प्रेम के बिना केवल प्रिय वचन बोलकर ही स्त्रियों को मनाता है तो उसकी बातें उनके हृदय में उसी प्रकार नहीं जँचती हैं, जैसे कृत्रिम रंग से रंगी मणि उसके पारखी के हृदय को।”

— कालिदास

“वायु धुएँ को भले ही उड़ा दे परंतु जहाँ भी घास-फूँस हो, अग्नि तो वहाँ पहुँच ही जाती है।”

— कालिदास

“विद्वानों का कहना है कि शरीरधारियों के लिए मरना स्वाभाविक है, जीना ही विकार है।”

— कालिदास

“बड़े लोगों से प्राप्त सम्मान अपने गुणों में विश्वास उत्पन्न कर देता है।”

— कालिदास

“कन्या तो दूसरे की ही संपत्ति होती है।”

— कालिदास

“मन पिछले जन्म के संबंध को भली भाँति जानता है।”

— कालिदास

“जिसने जन्म से लेकर आज तक धूर्तता नहीं सीखी है, उस व्यक्ति की बात तो अप्रामाणिक है और जो दूसरों को धोखा देने को एक विधा के रूप में सीखते हैं, वे पूर्ण सत्यवादी माने जाएँ।”

— कालिदास

“सेंध लगाते पकड़ा गया चोर भी यही कहता है कि वह दीवार में छेद करना सीख रहा था।”

— कालिदास

“क्या पृथ्वी पर पानी बरसाने के लिए भगवान मेंढकों की टर्र-टर्र की प्रतीक्षा करता है।”

— कालिदास

“मनुष्य उत्सव-प्रेमी होते हैं।”

— कालिदास

“अरे, इच्छित वस्तु मिल जाने पर कैसे विरोधी प्रभाव होते हैं।”

— कालिदास

“यशस्वी लोगों को शत्रुओं से यश की रक्षा करनी चाहिए।”

— कालिदास

“काम से पीड़ित लोग जड़-चेतन पदार्थों के संबंध में स्वभावतः विवेकशून्य हो जाया करते हैं।”

— कालिदास

संस्कृत व प्राचीन साहित्य के अन्य रचनाकार