“अंधकार मानो अंगों पर लेप कर रहा है। आकाश मानो अंजन बरसा रहा है। इस समय दृष्टि ऐसी निष्फल हो रही है जैसे दुष्ट पुरुषों की सेवा।”
— भास
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“अंधकार मानो अंगों पर लेप कर रहा है। आकाश मानो अंजन बरसा रहा है। इस समय दृष्टि ऐसी निष्फल हो रही है जैसे दुष्ट पुरुषों की सेवा।”
— भास
“मेरी बुद्धि धर्म और स्नेह के बीच में पड़कर झूल रही है।”
— भास
“मधुर पदार्थ भी अधिक खा लेने पर अजीर्ण कर देता है।”
— भास
“अपराधी की पूजा तो केवल वध है।”
— भास
“स्त्रियों का लड़कियों में अधिक स्नेह होता है।”
— भास
“यज्ञ, विवाह, संकट और वन में स्त्रियों का देखना है |”
— भास
“मनुष्य अपने ही दोषों से शंकित हुआ करता है।”
— भास
“दरिद्रता मनुष्यों के लिए उच्छ्वासयुक्त मरण है।”
— भास
“दुर्दशा शत्रुओं के मन में भी मंत्री भाव ला देती है।”
— भास
“अकुलीन कैसे इतना दयाशील होगा?”
— भास
“धर्म ही मनुष्य के द्वारा यत्नपूर्वक साध्य है।”
— भास
“स्त्रियों के तो पति ही अवलंब होते हैं।”
— भास
“लड़की के विवाह के समय माताओं को बड़ा दुःख होता है।”
— भास
“अकेला दूसरे के घर में प्रवेश करे, द्वितीय आदमी से मंत्रणा करे, बहुत आदमी लेकर युद्ध करे, यही शास्त्र का निर्णय है।”
— भास
“बंधुओं तथा मित्रों पर नहीं, शिष्य का दोष केवल उसके गुरु पर आ पड़ता है। माता-पिता का अपराध भी नहीं माना जाता क्योंकि वे तो बाल्यावस्था में ही अपने बच्चों को गुरु के हाथों में समर्पित कर देते हैं।”
— भास
“साक्षियों के सामने धरोहर लौटानी चाहिए।”
— भास
“न रूप, गौरव का कारण होता है और न कुल। नीच हो या महान उसका कर्म ही उसकी शोभा बढ़ाता है।”
— भास
“न देने पर (कन्यादान न करने से) तो लज्जा आती है और विवाह कर देने पर मन दुखी होता है। इस प्रकार धर्म और स्नेह के बीच में पड़कर माताओं को बड़ा कष्ट होता है।”
— भास
“प्रत्युपकारी मनुष्य विपत्ति में ही अपने कार्य का फल प्राप्त करता है।”
— भास
“समय बीतने पर उपार्जित विद्या नष्ट हो जाती है, मज़बूत जड़ वाले वृक्ष भी गिर पड़ते हैं, जल भी सरोवर में जाकर (गर्मी आने पर) सूख जाता है। किंतु हुत (हवनादि किया हुआ पदार्थ) या सत्पात्त को दिए दान का पुण्य ज्यों का त्यों बना रहता है।”
— भास
“मार्गरूपी नदियों में अंधकार बह रहा है। गृह-माला तटों के समान प्रतीत हो रही है। दसों दिशाएँ अंधकार में डूबी हुई हैं। अंधकार को मानो नौका से पार करना होगा।”
— भास
“प्रियजनों में दृढ़ हुए प्रेम को छोड़ना कठिन है। बार-बार उसका स्मरण करने से दुःख नया-सा हो जाता है। इस दशा में आँसू बहाना ही एकमात्र उपाय है। इससे प्रिय जन के प्रेम से उऋण होकर मन प्रसन्न होता है।”
— भास
“गुणशीलता, तात्कालिक परिस्थिति तथा भविष्य का विचार करके शीघ्रता तथा दीर्घसूत्रता दोनों को छोड़कर, देश-काल के अनुकूल अपना कार्य करना चाहिए।”
— भास
“दोषों को भूलकर भाइयों पर केवल स्नेह करना चाहिए, बंधुओं से प्रेम स्थापित करना, लोक-परलोक दोनों के लिए लाभदायक होता है।”
— भास
“यह निद्रा नेत्रों पर टिकी हुई, ललाट प्रदेश से उतरकर उसी प्रकार मुझे सता रही है, जैसे अदृश्य और चंचल वृद्धावस्था मनुष्य की शक्ति को पराजित करके बढ़ती जाती है।”
— भास
“यह रणभूमि वैर का आवास है, वीरता की कसौटी है, मान और प्रतिष्ठा का घर है, युद्धों में अप्सराओं की स्वयंवर सभा है, नरों की वीरता की प्रतिष्ठा है, राजाओं की अंतकाल में सोने योग्य वीरशय्या है, प्राणों का अग्निहोत्र नामक यज्ञ है, राजाओं के स्वर्गलोक जाने के लिए सेतु है—ऐसे 'रण' नामक आश्रम में हम आए हुए हैं।”
— भास
“सर्वत्र उदारता से काम नहीं करना चहिए।”
— भास
“पुत्र के लिए माताओं का हस्त-स्पर्श प्यासे के लिए जल-धारा के समान होता है।”
— भास
“समय ही पतन का कारण है।”
— भास
“देवता भक्ति से संतुष्ट होते हैं।”
— भास
“कन्या का पिता होना बहुत वंदनीय है।”
— भास
“पशु-पक्षी भी उपकार मानते हैं।”
— भास
“संग्राम में मारे जाने मर स्वर्ग प्राप्त होता है और जीतने पर यश मिलता है। लोक में दोनों ही माननीय हैं। अतः युद्ध करने में निष्फलता नहीं है।”
— भास
“जो अधीर और असमर्थ होते हैं, उनमें उत्साह उत्पन्न नहीं होता। प्रायः उत्साही पुरुष ही राजसंपत्ति का उपभोग करते हैं।”
— भास
“सत्कारपूर्वक स्वीकार किया गया सत्कार ही संतोष उत्पन्न करता है।”
— भास
“बिना जूठा किए कौन खा सकता है?”
— भास
“ज्ञानियों ने ज्येष्ठ भ्राता को पिता के समान कहा है।”
— भास
“सुख की अवस्था से जो दरिद्रता की दशा को प्राप्त होता है, वह तो शरीर से जीवित रहते हुए भी मृतक के समान ही जीता रहता है।”
— भास
“कार्य की सिद्धि होने पर लोग राजा के बल की प्रशंसा करते हैं और असिद्धि होने पर लोग मंत्री की बुद्धि को दोष देते हैं।”
— भास
“मीठे वचनों से स्वागत ही सच्चा अतिथि सत्कार होता है।”
— भास
“यदि तपस्या असफल हुई तो बल और बल के असफल होने पर तप।”
— भास
“मूल से वृक्ष उखाड़ देने पर डाल काटने में क्या परिश्रम है?”
— भास
“मृत्यु का समय आ जाने पर कौन किसको बचा सकता है? रस्सी के टूट जाने पर घड़े को गिरने से कौन रोक सकता है? इसी तरह मनुष्य भी वृक्षों के समान (जैसे वृक्ष समय-समय पर काटे जाते हैं और उत्पन्न हो जाते हैं) समय-समय पर मरते और उत्पन्न होते हैं।”
— भास
“समय की गति के अनुसार बदलने वाली जगत् की भाग्यदशा पहिए के अरों की भाँति (ऊपर-नीचे) होती रहती है।”
— भास
“मिथ्या प्रशंसा बहुत कष्टप्रद होती है।”
— भास
“सभी राजा राजकुमारी को उसी प्रकार चाहते हैं, जिस प्रकार मल्ल लोग विजय-पताका को चाहा करते हैं।”
— भास
“उदार जन का सेवक भी उदार ही होता है।”
— भास
“काल तो उपाय करने वाले से भी अधिक बलवान होता है।”
— भास
“मित्रता में छल नहीं किया जाता।”
— भास
“महान बंधु-स्नेह की तुलना में शरीर का प्रेम तुच्छ होता है।”
— भास