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कवि कर्णपूर — सूक्ति व विचार

कवि कर्णपूर के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। कवि कर्णपूर के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“सभी जंतु अपने-अपने कर्म के अनुसार जन्म लेते हैं, कर्मानुसार ही मरते हैं और कर्मानुसार ही विद्यमान रहते हैं। जो व्यक्ति जब जैसा कर्म करता है, वही देवता है।”

— कवि कर्णपूर

“पवित्र नदियाँ, बिना स्नान किए, अपने दर्शनमात्र से ही दर्शक का मन पवित्र कर देती हैं।”

— कवि कर्णपूर

“सुकवि के वचन अर्थादि का विचार किए बिना ही आनंदमग्न कर देते हैं, पुण्यमयी नदियाँ स्नान के बिना ही दर्शनमात्र से ही पवित्र कर देती हैं।”

— कवि कर्णपूर

“क्रोध से अंधा हुआ व्यक्ति ही परमांध होता है क्योंकि उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। केवल नेत्र से अंधा हुआ मनुष्य अंधा नहीं होता।”

— कवि कर्णपूर

“हे कमलनयनी! मूर्ख व्यक्ति शोक से पीड़ित होकर दुःखी होते रहते हैं परंतु बुद्धिमान लोग अज्ञान को दूर करके आनंदित होते हैं।”

— कवि कर्णपूर

“उपासनीय कौन है? जो सरस है सरस कोन है? जो प्रेम का स्थान है। प्रेम क्या है? जिसमें वियोग न हो। वह वियोग कौन सा है? जिससे प्रेमी जीवित नहीं रहते।”

— कवि कर्णपूर

“अलग-अलग बिखरे हुए शब्द तभी तक निर्दोष रह पाते हैं जब तक कवि उन्हें अपनी जिह्वा रूपी सुई से गूँथ नहीं देता (अर्थात् काव्य का सर्वथा निर्दोष होना असंभव है)।”

— कवि कर्णपूर

“जिनका मन श्रीकृष्ण के प्रेम से रहित है उनके क्रिया-नैपुण्य को धिक्कार है, उदारता (दानशीलता) को धिक्कार है, अधिक पढ़ी हुई विद्या को धिक्कार है, आत्मज्ञता को धिक्कार है, शील को धिक्कार है, यज्ञ आदि की रचना को धिक्कार है, पुरुषार्थ को तथा बुद्धि को धिक्कार है; ध्यान, आसन, धारणा को धिक्कार है, मंत्र-तंत्र की जानकारी को धिक्कार है, जन्म को तथा जीवन को धिक्कार है।”

— कवि कर्णपूर

“उत्कंठित व्यक्तियों की उत्कंठा समय की अपेक्षा करके नहीं होती।”

— कवि कर्णपूर

“संसार में अपना मत ही बहुत सम्मानित वस्तु लगता है।”

— कवि कर्णपूर

“प्रियतम के द्वारा भोगा हुआ गुण ही गुणत्व (गुण का भाव) को प्राप्त करता है।”

— कवि कर्णपूर

“भाग्य का लेख कौन टाल सकता है?”

— कवि कर्णपूर

“जिस जीवन की अवहेलना जीवननाथ करते हैं उस 'जीवन को धिक्कार है।”

— कवि कर्णपूर

“बंधुओं के गुण और दोष में गुण पर दृष्टि डालनी चाहिए, दोषों पर नहीं।”

— कवि कर्णपूर

“गुरु को किया गया प्रणाम कल्याणकारी होता है।”

— कवि कर्णपूर

“सुवर्ण की रेखा भी कसौटी के पत्थर के टुकड़े बिना अपने गुण को प्रकट नहीं कर पाती।”

— कवि कर्णपूर

“मधु स्वयं ही मत्त नहीं होता अपितु अपना पान करने वाले सभी जनों को मदमत्त कर देता है।”

— कवि कर्णपूर

“स्वाभाविक भाव छिपाया जाने पर भी छिपाया नहीं जा सकता।”

— कवि कर्णपूर

“प्राणी मात्र का सुकृत एव दुष्कृत फल से ही प्रगट हो जाता है।”

— कवि कर्णपूर

“प्राणी मात्र को अपनी आत्मा प्यारी लगती है, इसलिए स्वरचित ग्रंथों में उसकी दोषदृष्टि नहीं होती।”

— कवि कर्णपूर

“दुष्ट लोग नख और केश के समान ही हैं। जिनके कट जाने पर व्यथा का लेश भी नहीं रहता, जबकि बढ़ने पर सभी दुःखी होते हैं। कौन स्वतंत्र व्यक्ति इनका परित्याग नहीं करते?”

— कवि कर्णपूर

“हे दुष्ट की जिह्वा रूपी झाड़ू! यद्यपि तुम निरन्तर फेंके हुए मल के द्वारा भुवनतल को निर्मल करती रहती हो, फिर भी तुम्हारे स्पर्श में भय ही होता है।”

— कवि कर्णपूर

“जो लोग स्वभाव से ही दुष्ट होते हैं उनका ज्ञान भी विरुद्ध ही होता है।”

— कवि कर्णपूर

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