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हरिकृष्ण प्रेमी — सूक्ति व विचार

हरिकृष्ण प्रेमी के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। हरिकृष्ण प्रेमी के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“नारी पुरुष से पूजा नहीं चाहती। वह जीवन में सहयोग चाहती है दुःख और सुख के साथ। तन और मन का विलीनीकरण। दो जीवनों का एक होना।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

“दया और क्षमा भी मानव के धर्म हैं, तो शक्तिवान होना और उपयुक्त समय पर देश और धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का प्रयोग करना भी धर्म है।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

“सारे ही धर्म एक समान बात कहते हैं। मनुष्यता ऊँचे गुणों को विकसित करना ही धर्म का उद्देश्य है।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

“जो केवल ऐश्वर्य के पालने में पले हैं, वे ग़रीबों के दुःखों को नहीं जान सकते।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

“मानव की वाणी की अपेक्षा उसका कर्म अधिक अच्छा नेतृत्व कर सकता है।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

“वे सब, जिन्हें समाज घृणा की दृष्टि से देखता है, अपनी शक्तियों को एकत्र करें तो इन महाप्रभुओं और उच्च वंशाभिमानियों का अभिमान चूर कर सकते हैं।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

“हम दुर्बल मनुष्य राग-द्वेष से ऊपर रहकर कर्म करना नहीं जानते, अपने अभिमान के आगे जाति के अभिमान को तुच्छ समझ बैठते हैं।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

“कला का स्वाभाविक विकास स्वतंत्र वायुमंडल में हो सकता है—वह सीमा में बाँधी नहीं जा सकती, देश-काल के बंधन भी उसे संकुचित करते हैं, कोयल की भाँति वह अपने स्वरों से धरा-आकाश को भर देना देना चाहती है, लेकिन किसी के आदेश पर तान छेड़ने में उसे संकोच होता है।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

“संपूर्ण पृथ्वी ही माँ का खप्पर है। अखिल विश्व ब्रह्मांड ही सर्वव्यापिनी, सर्वशक्तिमती, सृष्टि और मरण की क्रीड़ा में निरत माँ भवानी का मंदिर है।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

“मृत्यु क्षणिक अंधकार है, इस अन्धकार के पीछे न जीवन का सूर्योदय है।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

“महत्त्वाकांक्षा की प्रेरणा मनुष्य को साहस, लगन और दृढ़ता प्रदान करती है, जिन गुणों के अभाव में मानव निर्जीव हो जाता है।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

“हिंसा का अहिंसा से प्रतिशोध करने के लिए महाप्राण चाहिए।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

“परिस्थितियाँ ही मनुष्य में साहस का संचार करती हैं।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

“त्याग में सुख अवश्य है किंतु त्याग का अर्थ कायरता नहीं होना चाहिए।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

“मनुष्य वह है जो दूसरे के लिए कष्ट सहे—आवश्यकता पड़ने पर प्राण भी दे दे।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

“भोग की जीवन में आवश्यकता है, किंतु भोग ही जीव का आदि-अंत नहीं है।”

— हरिकृष्ण प्रेमी

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