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ख़लील जिब्रान — सूक्ति व विचार

ख़लील जिब्रान के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। ख़लील जिब्रान के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“अपने देश के प्रति मेरा जो प्रेम है, उसके कुछ अंश में मैं अपने जन्म के गाँव को प्यार करता हूँ। और मैं अपने देश को प्यार करता हूँ पृथ्वी— जो सारी की सारी मेरा देश है—के प्रति अपने प्रेम के एक अंश में। और मैं पृथ्वी को प्यार करता हूँ अपने सर्वस्व से, क्योंकि वह मानवता का, ईश्वर का, प्रत्यक्ष आत्मा का निवास-स्थान है।”

— ख़लील जिब्रान

“तुम्हारा दुःख उस छिलके का तोड़ा जाना है, जिसने तुम्हारे ज्ञान को अपने भीतर छिपा रखा है।”

— ख़लील जिब्रान

“प्रेम और जो कुछ उससे उत्पन्न होता है, क्रांति और जो कुछ वह रचती है और स्वतंत्रता और जो कुछ उससे पैदा होता है, ये परमात्मा के तीन रूप हैं और परमात्मा सीमित और चेतन संसार का अनंत मन है।”

— ख़लील जिब्रान

“स्वर का गीत मीठा है सही, किंतु हृदय का गीत ही तो ईश्वर की सच्ची आवाज़ है।”

— ख़लील जिब्रान

“जो सहृदयता दर्पण में अपना मुख निरखती है, पत्थर बन जाती है। और सत्क्रिया जो अपने को सुंदर नामों से संबोधित करती है, अभिशाप की जननी बन जाती है।”

— ख़लील जिब्रान

“मैं एक शब्द कहने के लिए आया था और वह शब्द मैं अब कहता हूँ। परंतु यदि मृत्यु ने उसके कहे जाने में बाधा डाल दी, तो आने वाला कल उसे कहेगा, क्योंकि आने वाला कल अनंत की पुस्तक में कोई रहस्य नहीं रहने देता।”

— ख़लील जिब्रान

“धन तारों वाले वाद्य यंत्र के समान है। जो उसका भली प्रकार से प्रयोग करना नहीं जानता, केवल कर्कश संगीत ही सुनेगा। जो उसे रोके रहता है, उसे धन प्रेम के समान है। वह उसे धीरे-धीरे और दुःख देकर मारता है। और उसे वह जीवन प्रदान करता है, जो उसे अपने साथी मनुष्यों पर उँड़ेल देता है।”

— ख़लील जिब्रान

“जब मैं प्रेम से परिचित हुआ तो शब्द मेरे मुख में साँस बनकर रह गए और जो संगीत बाहर आने के लिए बेचैनी से मेरे हृदय में लहरे ले रहा था, वह गहरे मौन में खो गया।”

— ख़लील जिब्रान

“दार्शनिक की आत्मा उसके मस्तिष्क में निवास करती है। कवि की आत्मा उसके हृदय में, गायक की गले में, किंतु नर्तकी की आत्मा उसके अंग-प्रत्यंग में बसती है।”

— ख़लील जिब्रान

“बीता हुआ कल आज की स्मृति है और आने वाला कल आज का स्वप्न।”

— ख़लील जिब्रान

“धन्यता आँसुओं की पुत्री है और सत्य पीड़ा का पुत्र।”

— ख़लील जिब्रान

“और ऐसे भी लोग हैं जो देते हैं, लेकिन देने में कष्ट अनुभव नहीं करते, न वे उल्लास की अभिलाषा करते हैं और न पुण्य समझ कर ही कुछ देते हैं।”

— ख़लील जिब्रान

“प्रेम अपनी गहराई को वियोग की घड़ी आ पहुँचने के पहले तक स्वयं नहीं जानता।”

— ख़लील जिब्रान

“तुम्हारा मित्र तुम्हारे अभावों की पूर्ति है।”

— ख़लील जिब्रान

“तुम भले हो जब तुम अपने लक्ष्य की ओर दृढ़ता और साहसपूर्वक पैर बढ़ाते हो। लेकिन तब भी तुम बुरे नहीं हो जब तुम उस तरफ लँगड़ाते-लँगड़ाते जाते हो। लँगड़ाते हुए जाने वाले लोग भी पीछे की तरफ़ नहीं जाते।”

— ख़लील जिब्रान

“प्रेम आत्मा में अतीत का दूरस्थ अट्टहास है।”

— ख़लील जिब्रान

“मंदिर की कोण-शिला उसकी नींव में सबसे नीचे गड़े हुए पत्थर से ऊँची नहीं है।”

— ख़लील जिब्रान

“तुम्हारा दैनिक जीवन तुम्हारा मंदिर और तुम्हारा धर्म है।”

— ख़लील जिब्रान

“कभी न सोचना कि तुम प्रेम का पथ निर्धारित कर सकते हो, क्योंकि प्रेम यदि तुम्हें अधिकारी समझता है तो स्वयं तुम्हारी राह निर्धारित करता है।”

— ख़लील जिब्रान

“तुम इन्हें अपना प्रेम भले ही दो, लेकिन अपने विचार मत दो क्योंकि उनके अपने विचार हैं। तुम उनके शरीरों को भले ही घर में रखो, लेकिन उनकी आत्माओं को नहीं, क्योंकि उनकी आत्माएँ भावी के भवन में रहती है, जहाँ तुम नहीं पहुँच सकते—स्वप्न में भी नहीं।”

— ख़लील जिब्रान

“शाब्दिक ज्ञान क्या है—शब्दरहित ज्ञान की छाया मात्र ही तो।”

— ख़लील जिब्रान

“मिट्टी मनुष्य से कहती है, देख, मैं ही तेरा आदि हूँ और मैं ही तेरा अंत। सदा तेरा आदि और अंत में ही रहूँगी, जब तक कि सितारों का अंत न हो जाए और चाँद-सूरज जल-बुझ कर ढेर न हो जाएँ।””

— ख़लील जिब्रान

“प्रेम किसी को अपने आपके सिवा न कुछ देता है, न किसी से अपने आपके सिवा कुछ लेता है।”

— ख़लील जिब्रान

“तुम्हारे ज्ञान के उषा-काल में, जो कुछ पहले से ही अर्द्ध-निद्रित अवस्था में विद्यमान है, उसके अतिरिक्त कोई भी तुम्हारे आगे कुछ प्रकट नहीं कर सकता।”

— ख़लील जिब्रान

“संपूर्ण श्रम निस्सार है, सिवा उन घड़ियों के जिनमें प्रेम का अस्तित्व है।”

— ख़लील जिब्रान

“प्रेम जिस तरह तुम्हें मुकुट पहनाएगा उसी तरह शूली पर भी चढ़ाएगा।”

— ख़लील जिब्रान

“जब प्रेम तुम्हें अपनी ओर बुलाए तो उसका अनुगमन करो, यद्यपि उसकी राहें विकट और विषम हैं।”

— ख़लील जिब्रान

“दूर हुए बिना कोई वास्तव में समीप हो ही कैसे सकता है?”

— ख़लील जिब्रान

“तुम प्राय: कहते हो, 'मैं दान दूँगा, किंतु सुपात्र को ही।' तुम्हारी वाटिका के वृक्ष ऐसा नहीं कहते, न तुम्हारे चरागाह की भेड़ें।”

— ख़लील जिब्रान

“माँगने पर देना अच्छा है, लेकिन आवश्यकता अनुभव करके, बिना माँगे देना और भी अच्छा है।”

— ख़लील जिब्रान

“जो कुछ तुम्हारे पास है, सब एक दिन दिया ही जाएगा।”

— ख़लील जिब्रान

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