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शरत चंद्र चट्टोपाध्याय — सूक्ति व विचार

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“अभाव पर विजय पाना ही जीवन की सफलता है। उसे स्वीकार करके उसकी ग़ुलामी करना ही कायरपन है।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“यथार्थ प्यार करने में स्त्रियों की शक्ति और साहस पुरुष से कहीं अधिक है। वे कुछ नहीं मानतीं। पुरुष जहाँ भय विह्वल हो जाते हैं, स्त्रियाँ वहाँ स्पष्ट बातें उच्च स्वर से घोषित करने में दुविधा नहीं करतीं।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“जब देश में कोई विशेष नियम प्रतिष्ठित होता है, तब वह एक ही दिन में नहीं, बल्कि बहुत धीरे-धीरे संपन्न हुआ करता है। उस समय वे लोग पिता नहीं होते, भाई नहीं होते, पति नहीं होते-होते हैं केवल पुरुष। जिन लोगों के संबंध में वे नियम बनाए जाते है, वे भी आत्मीया नहीं होती, बल्कि होती हैं केवल नारियाँ।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“यदि समग्र भाव से समस्त नारी जाति के दुःख-सुख और मंगल-अमंगल की तह में देखा जाए, तो पिता, भाई और पति की सारी हीनताएँ और सारी धोखेबाज़ियाँ क्षण भर में ही सूर्य के प्रकाश के समान आप से आप सामने आ जाती हैं।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“अपने हाथ से अपने आदमियों की सेवा और यत्न करने में कितनी तृप्ति होती है, कितना आनंद मिलता है, यह स्त्री जाति के सिवा और कोई नहीं समझ सकता।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“पति को जिस स्त्री ने हृदय से धर्म के रूप में विचारन नहीं सीखा, उसके पैरों की जंजीर चाहे हमेशा बँधी हो रहे चाहे खुल जाए और अपने सतीत्व के जहाज़ को वह चाहे जितना भी बड़ा क्यों न समझती हो, परीक्षा के दलदल में पड़ने पर उसे डूबना ही पड़ेगा। वह पर्दे के अंदर भी डूबेगी और बाहर भी डूबेगी।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“नारी के सच्चे रूप का दर्शन कितनी बड़ी दुर्लभ वस्तु है, इस बात को जगत के अधिकांश लोग जानते ही नहीं।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“पुरुषों का क्षणिक दुःख तो क्षण भर में ही जाता है, लेकिन जिसे सदा दुःख सहना पड़ता है वह है नारी।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“प्राण स्वयं आपके अपने हैं। यदि आप चाहें तो अपने प्राण दे सकते हैं, लेकिन आपकी जो यह धारणा है कि स्त्री आपकी संपत्ति है, आप उसके स्वामी होने के कारण इच्छा होने पर अथवा आवश्यकता समझने पर उसके नारी धर्म पर भी अत्याचार कर सकते हैं, उसे जीती भी रख सकते हैं और मार भी सकते हैं और उसे वितरित भी कर सकते हैं, तो यह आपका अनधिकार है।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“नारी के लिए पति परम पूजनीय व्यक्ति है। सबसे बड़ा गुरुजन है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि स्त्री पुरुष की दासी है। यह संस्कार नारी को जितना छोटा, जितना तुच्छ कर देता है, उतना और कुछ नहीं।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“नारियों का सम्मान स्वयं उनके कारण नहीं होता, बल्कि वह उनकी संतान और पुत्र प्रसव पर निर्भर करता है।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“जो लोग दोनों आँखें खोले हुए देखते हैं, लेकिन वास्तव में देख नहीं पाते, उन्हीं के कारण सारी गड़बड़ी है। वे आप भी ठगे जाते हैं और दूसरों को भी ठगने से बाज़ नहीं आते।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“भगवान कितना अधिक दुःख-कष्ट मनुष्य को देते हैं, तब उसे सच्ची मानवता तक पहुँचा देते हैं।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“विधाता को दोष देती हूँ कि उन्होंने क्यों इतने कोमल और जल के समान तरल पदार्थ से नारी का हृदय गढ़ा था।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“संसार में जो लोग बड़े काम करने आते हैं, उनका व्यवहार हमारे समान साधारण लोगों के साथ यदि अक्षर-अक्षर न मिले, तो उन्हें दोष देना असंगत है, यहाँ तक कि अन्याय है।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“धर्मवस्तु को एक दिन हम लोगों ने जैसे दल बाँधकर मतलब गाँठकर पकड़ना चाहा था, वैसे उसे नहीं पकड़ा जा सकता। ख़ुद पकड़ाई दिए बग़ैर शायद उसे पाया ही नहीं जा सकता। परम दुःख की मूर्ति के रूप में जब वह मनु्ष्य की चरम वेदना की धरती पर पैर रखकर अकेला आ खड़ा हो, तब तो उसे पहचान ही लेना चाहिए। ज़रा भी भूल-भ्राँति उससे सही नहीं जाती, ज़रा में मुँह फेरकर लौट जाता है।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“लड़ाई-झगड़ा, वाद-विवाद और होड़ा-होड़ी करके चाहे जो चीज़ मिल जाए पर धर्म जैसी चीज़ नहीं मिल सकती।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“दुःसमय में जब मनुष्य को आशा और निराशा का कोई किनारा नहीं दिखाई देता तब दुर्बल मन डर के मारे आशा की दिशा को ही ख़ूब कस कर पकड़े रहता है।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“कवि केवल सृष्टि ही नहीं करता सृष्टि की रक्षा भी करता है। जो स्वभाव से ही सुंदर है उसे और भी सुंदर करके प्रकट करना जैसे उसका एक काम है, वैसे ही जो सुंदर नहीं है, उसे असुंदर के हाथ से बचा लेना भी उसका दूसरा काम है।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“जब तक इस संसार से पाप बिल्कुल ही मिटा न दिया जाएगा, जब तक मनुष्य का मन पत्थर न बन जाएगा, तब तक इस पृथ्वी में अन्याय-मूल भ्रांति होती ही रहेगी और उसे क्षमा करके प्रश्रय भी देना ही पड़ेगा।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“जिसे कुछ आशा है, वह एक तरह से सोचता है और कोई आशा नहीं होती, वह कुछ और ही प्रकार से सोचता है। पूर्वोक्त चिंता में सजीवता है, सुख है, तृप्ति है, दुःख है और उत्कंठा है। इसलिए वह मनुष्य को श्रांत कर देती है—वह अधिक समय तक नहीं सोच सकता। लेकिन आशाहीन को न तो सुख है, न दुःख है, न उत्कंठा है, फिर भी तृप्ति है।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“कैसा भीषण तांडव इस हृदय के अंदर हो रहा है। यह क्या पृथ्वी के किसी भी भूकंप से छोटा है?”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“मेरे बारे में पूछताछ करने वाला संसार में एक प्रकार से कोई नहीं है। इसलिए अगर कोई मेरे बारे में भला-बुरा जानना चाहता है, तो सुनकर हृदय कृतज्ञता से भर जाता है, मेरे जैसे हतभाग्य संसार में बहुत ही कम है।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“जीवन के अज्ञात पथ में मनुष्य के साथ मनुष्य का गहरा परिचय कब किस दिन किस माध्यम से कैसे हो जाता यह कोई नहीं जानता।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“इस पृथ्वी पर एक ख़ास तरह के आदमी हैं जो मानों फूस की आग हैं। वे झट से जल भी उठते हैं और फिर चटपट बुझ भी जाते हैं। उन लोगों के पीछे सदा-सर्वदा एक आदमी रहना चाहिए जो आवश्यकता के अनुसार उनके लिए फूस जुटा सके।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“पति को जो वास्तव में धर्म समझकर, परलोक की वस्तु समझकर ग्रहण कर सकी है, उसके पैरों की बेड़ी चाहे तोड़ दी और चाहे बंधी रहने दी, उसके सतीत्व की परीक्षा अपने-आप हो ही गई, समझ लो।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“जंगल में रहने वाले पक्षी की उपेक्षा पिंजड़े का पक्षी ही अधिक फड़फड़ाता है।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“ऊधम मचाना एक तरह का नशा है। न मचा सकने से तकलीफ़ होती है, हुड़क-सी आने लगती है।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“अर्थहीन अकारण विप्लव की चेष्टा में रक्तपात होता है, और कोई फल प्राप्त नहीं होता। विप्लव की सृष्टि मनुष्य के मन में होती है, केवल रक्तपात में नहीं। इसी से धैर्य रखकर उसकी प्रतीक्षा करनी होती है।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“संभवत: आँखें रहने से जिस मार्ग से मनुष्य नहीं जाता, उस प्रकार के मार्ग में प्रेम उसको ले जाता है।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“प्यार के धन का, सचमुचही कोई अपने हाथ से अमंगल नहीं कर सकता। उसका निज का दुःख चाहे जितना हो वह सहना ही होगा।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“कमल के पत्ते पर ओस की बूंद के समान मानव जीवन है, हम लोग सिर्फ़ मुँह से ही यह कहते हैं, परंतु काम पड़ने पर करके नहीं दिखाते।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“यह मैं नहीं मानता कि मन ही मन क्षमा चाहने की अपेक्षा प्रकट रूप से क्षमा माँगना ही हर हालत में सबसे बड़ी बात है।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“संसार की सारी चीज़ें सफ़ाई और गवाही को साथ लेकर नहीं आती, इसलिए यदि उन्हें व्यर्थ समझ कर छोड़ दिया जाए तो हमें बहुत सी चीज़ों से वंचित रहना पड़ेगा।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“क्षमा का फल क्या सिर्फ़ अपराधी को ही मिलता है? जो क्षमा करता है, उसे क्या कुछ भी नहीं मिलता?”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“जो लोग यह समझते हैं कि संसार में और सब कामों के लिए तैयारी की आवश्यकता होती है, केवल विप्लव ही ऐसा काम है जिसमें तैयारी का कोई आवश्यकता नहीं होती—उसे प्रारंभ कर देने से ही काम चल जाता है, वे चाहे और जितना कुछ जानें विप्लव तत्त्व के विषय में कुछ नहीं जानते।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

“आदमी आदमी का बहुत कुछ जानता है, तो भी बहुत से काम वह उससे छिप कर आड़ से करता है।”

— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

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