“अभी में अल्पायु बाला थी। दम भर में ही पूर्ण-यौवना बनी। अभी मैं चलती-फिरती थी और अभी जलकर राख बन गई।”
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लल्लेश्वरी — सूक्ति व विचार
लल्लेश्वरी के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। लल्लेश्वरी के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।
“विचारहीन लोग धर्मग्रंथों को उसी प्रकार बाँचते रहते हैं, जिस प्रकार पिंजरे में तोता राम-राम की रट लगाता है।”
“भूख-प्यास से इस देह को तड़पाना नहीं। ज्यों ही बुझने लगे, त्योंही इसे सँभालना। तेरे व्रत-उपवास और साज-सिंगार पर धिक्कार। उपकार कर यही तेरा परम कर्तव्य-कर्म है।”
“हे मूढ़! व्रतधारण और साज-सज्जा कर्तव्य कर्म नहीं है। न ही मात्र काया की रक्षा कर्तव्य कर्म है। भोले मानव! देह की सार-संभाल ही कर्तव्य कर्म नहीं। सहज विचार (आत्म-तत्त्वचिंतन) वास्तविक उपदेश है।”
“खान-पान के अतिरेक से किसी उद्देश्य को नहीं पाएगा और निराहार बनकर अहंकारी बन जाएगा। भोजन युक्त हो (न कम, न अधिक) उसी से समरसता रहेगी। समरसतायुक्त आहार-विहार से ही बंद द्वार खुल जाएँगे।”
“वह तेरे निकट है, दूर खोजने की आवश्यकता नहीं। वह शून्य के साथ शून्य मिल जाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं।”
“उसका जो भी कुछ नाम हो, शिव हो, केशव हो, जिन हो अथवा कमलजनाथ हो—मुझ अबला को भव-रोग से मुक्त कर दे।”
“जिस पर बन न आई हो—वह दर्द क्या जाने।”
“यदि कोई जीते जी ही मर जाए तो वही ज्ञान है।”
“शेरनी का शिकार बाज़ को क्या मालूम! बाँझ को पुत्र के प्रति वात्सल्य का क्या ज्ञान !”