“तुम्हारे पास क्या है; उससे नहीं, वरन् तुम क्या हो उससे ही तुम्हारी पहचान है।”
— ओशो
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“तुम्हारे पास क्या है; उससे नहीं, वरन् तुम क्या हो उससे ही तुम्हारी पहचान है।”
— ओशो
“शांति को चाहो। लेकिन ध्यान रहे कि उसे तुम अपने ही भीतर नहीं पाते हो, तो कहीं भी नहीं पा सकोगे। शांति कोई बाह्य वस्तु नहीं है।”
— ओशो
“आदर्श आकांक्षा मात्र ही नहीं है। वह संकल्प भी है। क्योंकि जिन आकांक्षाओं के पीछे संकल्प का बल नहीं, उनका होना या न होना बराबर ही है।”
— ओशो
“धर्म भय से ऊपर उठने का उपाय है; क्योंकि धर्म जीवन को जोड़ने वाला सेतु है।”
— ओशो
“अस्पर्श में प्रतिष्ठित हो जाने का नाम ही संयम है। और, संयम सत्य का द्वार है।”
— ओशो
“जब किसी की निंदा का विचार मन में उठे तो जानना कि तुम भी उसी ज्वर से ग्रस्त हो रहे हो। स्वस्थ व्यक्ति कभी किसी की निंदा में संलग्न नहीं होता।”
— ओशो
“शरीर एक बदलता हुआ प्रवाह है और मन भी। उन्हें जो किनारे समझ लेते है, वे डूब जाते है।”
— ओशो
“श्री अरविंद का वचन है: ‘सम होना या'नी अनंत हो जाना।’ असम होना ही क्षुद्र होना है और सम होते ही विराट को पाने का अधिकार मिल जाता है।”
— ओशो
“ज्ञान का कोई पक्ष नहीं है। सभी पक्ष अज्ञान के है। ज्ञान तो निष्पक्ष है।”
— ओशो
“जीवन-पथ पर चलने में जो असमर्थ हैं, वे राह के किनारे खड़े हो दूसरों पर पत्थर ही फेंकने लगते हैं।”
— ओशो
“स्मरण रहे कि महत्वाकांक्षा अशांति का मूल है। जिसे शांति चाहनी है, उसे महत्वकांक्षा छोड़ देनी पड़ती है। शांति का प्रारंभ वहाँ से है, जहाँ कि महत्वाकांक्षा का अंत होता है।”
— ओशो
“लोग मुझसे पूछते हैं : योग क्या है? मैं उनसे कहता हूँ : ‘अस्पर्श’ भाव। ऐसे जियों कि जैसे तुम जहाँ हो वहाँ नहीं हो।”
— ओशो
“जीवन की समस्तता और समग्रता के प्रति स्वीकार का पा लेने का नाम ही सम भाव है।”
— ओशो
“समत्व अद्वितीय है।”
— ओशो
“अपने अंतरतम की गहराइयों में इस प्रश्न को गूँजने दो: 'मैं कौन हूँ?' जब प्राणों की पूरी शक्ति से कोई पूछता है, तो उसे अवश्य ही उत्तर उपलब्ध होता है।”
— ओशो
“न शरीर तट है, न मन है। उन दोनों के पीछे जो चैतन्य है, साक्षी है, द्रष्टा है, वह अपरिवर्तित नित्य बोध मात्र ही वास्तविक तट है। जो अपनी नौका की उस तट से बाँधते है, वे अमृत को उपलब्ध होते है।”
— ओशो
“विचारों को छोड़ों और निर्विचार हो रहो, पक्षों को छोड़ो और निष्पक्ष हो जाओ—क्योंकि इसी भाँति”
— ओशो
“प्रत्येक व्यक्ति एक दर्पण है। सुबह से साँझ तक इस दर्पण पर धूल जमती है और जो इस धूल को जमते ही जाने देते हैं, वे दर्पण नहीं रह जाते।”
— ओशो
“भय ही अधर्म है; क्योंकि जीवन को न जानने के अतिरिक्त और क्या अधर्म हो सकता है?”
— ओशो
“मनुष्य प्रभु को पाने का मार्ग है, और जो मंज़िल को छोड़ मार्ग से ही संतुष्ट हो जावें, उनके दुर्भाग्य को क्या कहें?”
— ओशो
“सत्य की आकांक्षा है तो स्वयं को छोड़ दो।”
— ओशो
“ईश्वर कोई बाह्य सत्य नहीं है। वह तो स्वयं के ही परिष्कार की अंतिम चेतना अवस्था है। उसे पाने का अर्थ स्वयं वही हो जाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।”
— ओशो
“भीतर इतनी गहराई हो कि कोई तुम्हारी थाह न ले सके। अथाह जिनकी गहराई है, अगोचर उनकी ऊँचाई हो जाती है।”
— ओशो
“मैं कौन हूँ? जो स्वयं इन प्रश्न को नहीं पूछता है, ज्ञान के द्वार उसके लिए बंद ही रह जाते हैं।”
— ओशो
“‘मैं’ को भूल जाना और ‘मैं’ से ऊपर उठ जाना सबसे बड़ी कला है।”
— ओशो
“जन्म का अंत है, जीवन का नहीं। और मृत्यु का प्रारंभ है, जीवन का नहीं। जीवन तो उन दोनों से पार है। जो उसे नहीं जानते हैं, वे जीवित होकर भी जीवित नहीं हैं। और जो उसे जान लेते हैं, वे मर कर भी नहीं मरते।”
— ओशो
“स्वयं के भीतर जो है, उसे जानने से ही जीवन मिलता है। जो उसे नहीं जानता वह प्रतिक्षण मृत्यु से और मृत्यु भय से ही घिरा रहता है।”
— ओशो
“जो स्वयं की मृत्यु को जान लेता है, उसकी दृष्टि संसार से हटकर सत्य पर केंद्रित हो जाती है।”
— ओशो
“जिसके चित्त में ‘नहीं’ है, वह समग्र से एक नहीं हो पाता है। सर्व के प्रति ‘हाँ’ अनुभव करना जीवन की सबसे बड़ी क्रांति है क्योंकि वह ‘स्व’ को मिटाती है और ‘स्वयं’ से मिलाती है।”
— ओशो
“जन्म का अंत है, जीवन का नहीं। और मृत्यु का प्रारंभ है, जीवन का नहीं। जीवन तो उन दोनों से पार है जो उसे नहीं जानते है, वे जीवित होकर भी जीवित नहीं है। और जो उसे जान लेते हैं वे मर कर भी नहीं मरते।”
— ओशो
“मनुष्य को प्रतिक्षण और प्रतिपल स्वयं को नया कर लेना होता है। उसे अपने को ही जन्म देना होता है। स्वयं के सतत् जन्म की इस कला को जो नहीं जानते हैं, वे जानें कि वे कभी के ही मर चुके हैं।”
— ओशो
“कुछ पाने की और कुछ होने की आकांक्षा ही दु:ख है। दु:ख कोई नहीं चाहता, लेकिन आकांक्षाएँ हों तो दु:ख बना ही रहेगा।”
— ओशो
“अहंकार एकमात्र जटिलता है। जिन्हें सरल होना है, उन्हें इस सत्य को अनुभव करना होगा।”
— ओशो
“जीवन का अज्ञान ही मृत्यु का भय है।”
— ओशो
“जो ऐसे जीता है कि जैसे मृत है, वह जीवन में भी सारभूत है, उसे अवश्य ही जान लेता है।”
— ओशो
“जीवन क्या है? जीवन के रहस्य में प्रवेश करो। मात्र जी लेने से जीवन चुक जाता है, लेकिन ज्ञात नहीं होता।”
— ओशो
“पाप और पुण्य मात्र कृत्य ही नहीं हैं। वस्तुतः तो वे हमारे अंतःकरण के सोये होने या जागे होने की सूचनाएँ हैं।”
— ओशो
“शरीर से बीमार ही नहीं, मन से बीमार भी दया के पात्र हैं।”
— ओशो
“स्वयं को खोकर कुछ करो, तो उससे ही स्वयं को पाने का मार्ग मिल जाता है।”
— ओशो
“संदेह स्वस्थ चिंतन का लक्षण है और उसके सम्यक् अनुगमन से ही सत्य के ऊपर पड़े पर्दे क्रमशः गिरते जाते हैं और एक क्षण सत्य का दर्शन होता है।”
— ओशो
“हृदय की इच्छाएँ कुछ भी पाकर शांत नहीं होती है क्यों? क्योंकि हृदय तो परमात्मा को पाने के लिए बना है।”
— ओशो
“मृत्यु से भयभीत केवल वे ही होते है जो कि जीवन को नहीं जानते। मृत्यु का भय जिसका चला गया हो, जानना कि वह जीवन से परिचित हुआ है। मृत्यु के समय ही ज्ञात होता है कि व्यक्ति जीवन को जानता था या नहीं?”
— ओशो
“आदर्श अंधकार से सूर्य की ओर उठने की आकांक्षा है। जो उस आकांक्षा से पीड़ित नहीं होता है, वह अंधकार में ही पड़ा रह जाता है।”
— ओशो
“जीवन में ही मरना सीख लेने से बड़ी और कोई कला नहीं है।”
— ओशो
“आदर्शविहीन जीवन कैसा है?—उस नाव की भाँति, जिसमें मल्लाह न हों या कि हों तो सोए हो।”
— ओशो
“साधु के पास उसे कुछ देने नहीं, वरन् उससे कुछ लेने जाना चाहिए। जिनके पास भीतर कुछ है, वे ही बाहर का सब कुछ छोड़ने में समर्थ होते है।”
— ओशो
“जीवन में जो दिखाई पड़ता है, उसकी ही नहीं, उसकी भी सत्ता है, जो कि दिखाई नहीं पड़ता है।”
— ओशो
“पशु को हमने पीछे छोड़ा है, प्रभु को हमें आगे पाना है। हम पशु और प्रभु के बीच एक सेतु से ज़्यादा नहीं हैं।”
— ओशो
“प्रेम को विचारों मत—जियो।”
— ओशो
“जीवन के तथाकथित सुखों की क्षणभंगुरता को देखो। उसका दर्शन ही, उनसे मुक्ति बन जाती है।”
— ओशो