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संत तुकाराम — सूक्ति व विचार

संत तुकाराम के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। संत तुकाराम के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“अभ्यास के बिना साध्य की प्राप्ति हो, यह संभव नहीं है।”

— संत तुकाराम

“अंधे की लाठी पकड़ने वाला अंधा हो तो दोनों ही गड्ढे में गिरते हैं।”

— संत तुकाराम

“मनुष्य इस संसार में दो दिन का अतिथि है।”

— संत तुकाराम

“धर्म का अर्थ है प्राणियों पर दया।”

— संत तुकाराम

“प्राणियों का पालन और दुष्टों का संहार — इसी का नाम है 'दया'।”

— संत तुकाराम

“मेघ वर्षा करते समय यह नहीं देखता कि वह भूमि उपजाऊ है या ऊसर। वह दोनों को समान रूप से सींचता है। गंगा का पवित्र जल उत्तम और अधम का विचार किए बिना सबकी प्यास बुझाता है।”

— संत तुकाराम

“स्वामी का कार्य, गुरु भक्ति, पिता के आदेश का पालन, यही विष्णु की महापूजा है।”

— संत तुकाराम

“आयु का अंतिम दिन सुखद व्यतीत हो, इसलिए यह कठिन परिश्रम मैंने किया। अब मैं चिंतारहित होकर विश्राम कर रहा हूँ तृष्णा की दौड़ समाप्त हो चुकी है।”

— संत तुकाराम

“दुःखकातर व्यक्तियों को दान देना ही सच्चा पुण्य है।”

— संत तुकाराम

“यदि तदनुसार आचरण नहीं किया तो केवल कहने या पढ़ने से क्या लाभ?”

— संत तुकाराम

“दीन-दुखियों की सेवा ही प्रभु की पूजा है।”

— संत तुकाराम

“फल की आशा को त्याग कर कर्म करो।”

— संत तुकाराम

“हरि कथा तो भगवान्, भक्त और नाम का त्रिवेणी-संगम है।”

— संत तुकाराम

“जिस मनुष्य के हाथ में क्षमारूपी शस्त्र हो, उसका दुष्ट क्या बिगाड़ सकता है? यदि दावाग्नि में तृण न पड़े, तो वह स्वयं ही बुझ जाती है।”

— संत तुकाराम

“तिलक और माला धारण कर लेने मात्र से हृदय में भक्तिभाव नहीं जाग जाता है। यदि कोई प्रेम के बिना कोरा उपदेश देता है तो वह व्यर्थ ही भौंकता है—अनुभव के बिना बोलना निरुपयोगी है।”

— संत तुकाराम

“जो अन्य से आशा नहीं करता, वही शूर है।”

— संत तुकाराम

“पत्थर को पारस के स्पर्श से क्या लाभ?”

— संत तुकाराम

“हे मन! मायाजाल में मत फँसो, काल अब ग्रसना ही चाहता है।”

— संत तुकाराम

“पत्थर की प्रभु-मूर्ति भी है और पत्थर की सीढ़ी भी है। एक की पूजा करते हैं, दूसरे पर पैर रखते हैं। सार वस्तु है भाव। यही अनुभव में भगवान होकर प्रकट होता है।”

— संत तुकाराम

“जो बच्चे ज्ञानी हैं, उन्हें माँ भी दूर रखती है।”

— संत तुकाराम

“चित्त में तो काम, क्रोध, लोभ भरा हुआ है पर ऊपर से विरक्त बने हुए हैं। कोरे शब्द ज्ञान से संसार को धोखा दे रहे हैं।”

— संत तुकाराम

“जिस कर्म से ईश्वर हमसे दूर होता है वह पाप है।”

— संत तुकाराम

“यह संसार निस्सार है, केवल भगवान ही सार है।”

— संत तुकाराम

“जैसा बोले वैसा ही आचरण करे।”

— संत तुकाराम

“सब कुछ ब्रह्म रूप है, कोई स्थान उससे रिक्त नहीं, तब प्रतिमा ईश्वर न हो यह कैसे हो सकता है?”

— संत तुकाराम

“तुकाराम कहते हैं कि अब मैं उपकार के लिए ही रह गया हूँ।”

— संत तुकाराम

“जो शत्रु हाथ में शस्त्र लेकर आया है, उसे तलवार से ही नष्ट करना चाहिए।”

— संत तुकाराम

“आवश्यकता से अधिक बोलना व्यर्थ है।”

— संत तुकाराम

“सर्वस्व न्योछावर करने पर ही भक्ति की प्राप्ति होती है।”

— संत तुकाराम

“प्रेम बोला नहीं जा सकता, बताया नहीं जा सकता दिखाया नहीं जा सकता। प्रेम चित्त से चित्त का अनुभव है।”

— संत तुकाराम

“जब मैं शुद्ध ज्ञान को खोजने चला तब देखा कि ज्ञान की पीठ पर अहंकार का भूत सवार रहता है।”

— संत तुकाराम

“कांतिहीन के अंग पर अलंकार भी अपने भाग्य को रोते हैं।”

— संत तुकाराम

“नर, नारी, बालक सभी नारायण हैं। ऐसा मेरा मन बना दो, हे प्रभु!”

— संत तुकाराम

“ऐसे दुष्ट बहुत होने चाहिए। हम पर उनका उपकार है। वे हमारे पापों का प्रक्षालन, बिना कोई मूल्य लिए और बिना साबुन के करते हैं। वे मुफ़्त में मज़दूर हैं जो हमारा बोझा ढोते हैं। वे हमें भवसागर से पार कर देते हैं और स्वयं नरक चले जाते हैं।”

— संत तुकाराम

“जिसमें भगवान् रूपी मिश्रण है, ऐसा जो भी अन्न हम लेते हैं, उसमें स्वाद आ जाता है।”

— संत तुकाराम

“प्रेम की कलह है। बच्चा पल्ला पकड़कर ऐंचता-ऐठता है। पिता को इधर-उधर हिलने नहीं देता है। यदि पिता चाहे तो बच्चे को झटक सकता है, उसमें कौन से बड़े बल की ज़रूरत है? झटका देने में देर भी कितनी लगेगी? परंतु स्नेह-सूत्र के जाल ऐसे हैं, कि बलवान भी उनमें फँस जाते हैं।”

— संत तुकाराम

“भक्ति रूपी वधू से विवाह हो गया है। अब चार दिन आनंद ही आनंद है।”

— संत तुकाराम

“हे प्रभु, क्या सो गए? जल्दी आओ।”

— संत तुकाराम

“तुकाराम कहता है कि मन पर अंकुश चाहिए।”

— संत तुकाराम

“सर्वस्व न्यौछावर करने पर ही प्रभु प्राप्ति हो सकती है।”

— संत तुकाराम

“जैसे हीरे से हीरा चीरा जाता है वैसे ही मन को मन से धरना होता हैं।”

— संत तुकाराम

“हीरे की परख पारखी को होती है।”

— संत तुकाराम

“तुकाराम कहता है कि निश्चय का बल हो तो फल की प्राप्ति है।”

— संत तुकाराम

“यदि तुम किसी को दूध नहीं पिला सकते तो मत पिलाओ, परंतु छाछ देने में क्या हानि है? यदि किसी को अन्न देने में समर्थ नहीं हो तो क्या प्यासे को पानी भी नहीं पिला सकते?”

— संत तुकाराम

“प्रभु का सर्वत्र सुकाल है, दुर्भाग्यशाली को अकाल है।”

— संत तुकाराम

“मिट्टी का पशुपति (शिव) बनाया तो उससे मिट्टी की क्या महत्ता? शिव की पूजा शिव को प्राप्त होती है, और मिट्टी मिट्टी में मिल जाती है। पत्थर का विष्णु बनाया किंतु विष्णु पत्थर नहीं है। विष्णु की पूजा विष्णु को प्राप्त होती है और पत्थर, पत्थर के रूप में ही रह जाता है।”

— संत तुकाराम

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