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जे. कृष्णमूर्ति — सूक्ति व विचार

जे. कृष्णमूर्ति के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। जे. कृष्णमूर्ति के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि चाहो सो करो, बल्कि इसका अर्थ है मुक्त हो जाना—जीवन के समस्त संघर्षों से, हमारी समस्याओं से, हमारी चिंताओं से, हमारे भय से, हमारे मनोवैज्ञानिक घावों से तथा उन समस्त द्वंद्वों से, जिन्हें हम हज़ारों वर्षों से सहन करते आए हैं।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“जब समग्र मुक्ति घटित होती है, तब आपके पास देवी-देवता और कर्मकांड नहीं होता—आप एक मुक्त पुरुष होते हैं।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“मानवता भय के साथ जीती आई है, वह भय का समाधान कभी नहीं कर पाई, कभी नहीं।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“जब आप समग्र रूप से सावधान होते हैं, तो वहाँ कोई 'स्व' नहीं हो सकता।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“सीखने के कर्म से स्वतः ही एक असाधारण अनुशासन का जन्म होता है, और आत्मसंयम के एक आंतरिक बोध के लिए अनुशासन आवश्यक है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“स्वार्थ ही भ्रष्टाचार और विनाश का आरंभ है, चाहे यह किसी राजनीतिज्ञ में हो या किसी धार्मिक आदमी में। स्वार्थ पूरे संसार पर हावी है और इसीलिए द्वंद्व है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“स्व सदा सीमित होता है और इसीलिए यह द्वंद्व का कारण है। हमारे समस्त संघर्ष, दुःख, चिंता आदि का यही है केंद्रीय बिंदु।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“हमारा मस्तिष्क स्मृति का उपकरण है, उन घटनाओं की स्मृति, जो घटित हो चुकी हैं—हमारा अनुभव इत्यादि यानी स्मृति की पूरी पृष्ठभूमि।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“आप जो कुछ भी करते हैं; अच्छा या बुरा, वह शेष मानवता को प्रभावित करता है, क्योंकि आप मानवजाति हैं।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“स्वतंत्रता यानी समग्र मुक्ति का अर्थ है—एक असीम अवकाश की उपलब्धि।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“कर्म जब किसी विचारधारा पर आधारित होता है, तो वह कर्म नहीं होता।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“समय और विचार एक ही हैं, वे दो अलग-अलग गतियाँ नहीं हैं।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“अंतर्वस्तु के बिना चेतना का कोई अस्तित्व नहीं है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“सीखने का अर्थ सिर्फ़ दृष्टिगत रूप से यानी आँखों से ही देखना नहीं है, बल्कि बिना किसी विकृति के देखना भी है, अर्थात् वस्तुओं को जस का तस देखना।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“सीखना वस्तुतः ज्ञान अर्जित करने से बिल्कुल भिन्न है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“आरोपित और थोपी हुई नैतिकता वस्तुतः सदाचार नहीं है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“जब आप किसी अद्भुत पर्वत के शाश्वत हिममंडित शिखर को देखते हैं, या नीले आकाश की पृष्ठभूमि में पर्वत की शृंखलाओं को देखते हैं, तब एक क्षण के लिए उस पर्वत की विराट्ता, आपके अहं को यानी 'मैं' तथा उसकी समस्त समस्या और चिंता को परे हटा देती है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“सत्य बहुत ख़तरनाक है, क्योंकि वह हमारे अंदर क्रांति ले आता है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“किसी वस्तु को पहचान लेना, वस्तुतः विचार ही है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“प्रेम इंद्रिय सुख नहीं है। प्रेम कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जो विचार द्वारा निर्मित हो और न ही यह सुखद संवेदना या उत्तेजना पर आधारित है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“यदि कोई वस्तु सतत बनी रहे, तो स्वयं को पुनः नया कर सकती है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“मृत्यु भी एक अत्यंत असाधारण चीज़ है, होना ही चाहिए और यदि आप भयभीत हैं, तो आप इसकी गहराई और महानता को नहीं देख पाएँगे।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“सातत्य से अधिक महत्वपूर्ण है अंत। अंत हो जाने का अर्थ है, एक नवीनता का आरंभ।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“कर्म का अर्थ है, वह जो तत्क्षण किया जा रहा है—सम्यक् रूप से, समग्र रूप से, अखंड रूप से।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“यदि आप दूसरों से सहमत न हों, तो वे आपको मार डालते हैं—यही हो रहा है संसार में।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“मन—जिसमें मस्तिष्क और हृदय समाविष्ट हैं—को पूर्ण संगति में होना चाहिए।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“जब आप अपना तादात्म्य किसी भी चीज़ के साथ पूर्ण रूप से कर लेते हैं, तो आप वही चीज़ हो जाते हैं।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“ध्यान के लिए वस्तुतः सर्वोच्च ढंग की संवेदनशीलता चाहिए तथा प्रचण्ड मौन की एक गुणवत्ता चाहिए—ऐसा मौन जो प्रेरित, अनुशासित या साधा हुआ नहीं हो।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“हिंसा से मुक्त हो जाने का अर्थ है उस प्रत्येक चीज़ से मुक्त हो जाना, जिसे एक मनुष्य को साँप रखा है, जैसे—विश्वास, धार्मिक मत, कर्मकाँड तथा इस तरह की मूढ़ताएँ : मेरा देश, मेरा ईश्वर, तुम्हारा ईश्वर, मेरा मत, तुम्हारा मत, मेरा आदर्श, तुम्हारा आदर्श।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“विचारक अपने विचारों से अलग नहीं है, विचारक स्वयं विचार है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“किसी भी चीज़ का अवलोकन करने के लिए—चाहे यह आपकी पत्नी हो, आपका पड़ोसी हो या बादल हो—आपके पास एक ऐसा मन होना चाहिए जो अत्यंत संवेदनशील हो।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“प्रेम का क्या अर्थ है, यह पता लगाने के लिए आपको अपना पूरा जीवन देना होगा, वैसे ही जैसे यह पता लगाने के लिए कि ध्यान क्या है एवं सत्य क्या है, आपको अपना पूरा जीवन देना पड़ता है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“बस आप जानिए कि असावधान हैं; इस तथ्य के प्रति चुनावरहित रूप से सजग रहिए कि आप असावधान हैं, और हैं तो क्या हुआ? यानी इसके लिए चिंता मत कीजिए एवं असावधानी की इस अवस्था में, असावधानी के इन क्षणों में, यदि आप कुछ कर बैठें–तो उस क्रिया के प्रति सजग रहिए।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“बुद्धत्व का आगमन दूसरे द्वारा नहीं होता, इसका आगमन स्वयं आपके अवलोकन एवं स्वयं की समझ से ही होता है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“आप बिना किसी पुस्तक को पढ़े या बिना साधु—संतों और विद्वानों को सुने अपने मन का अवलोकन कर सकते हैं।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“जब आपके पास परम संवेदनशीलता होती है, तो प्रज्ञा के साथ-साथ प्रेम का भी प्रादुर्भाव होता है—प्रेम तब आनंद ही, प्रेम तब समयातीत है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“सही अर्थों में व्यक्ति वही है जो स्वयं में विभाजित और खंडित नहीं है। किंतु हम खंड-खंड टूटे हुए हैं, अतः हम व्यक्ति नहीं है। जो समाज है, वही हम भी हैं।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“बुद्धत्व का आगमन किसी नेता या गुरु द्वारा नहीं होता, आपके भीतर जो कुछ है उसकी समझ द्वारा ही इसका आगमन होता है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“क्या आपने कभी बिलकुल शांत और स्थिर बैठने की कोशिश की है, इस ढंग से कि आँखों की या शरीर के अन्य अंगों की एक भी हरकत या हलचल न हो? दो मिनट इसे करें। इस दो मिनट में सारा कुछ प्रकट हो जाता है— यदि आप देखने की कला जानते हैं।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“जो मन मुक्ति के एक साधन के रूप में ज्ञान में जकड़ा हुआ है, वह उस मुक्ति तक पहुँच नहीं पाता।”

— जे. कृष्णमूर्ति

“आपका समस्त जीवन भय से एक पलायन है। आपके ईश्वर, आपके मंदिर-गिरजाघर, आपकी नैतिक शिक्षाएँ, ये सभी भय पर आधारित हैं, इन्हें समझने के लिए आपको यह समझना होगा कि इस भय का जन्म कैसे होता है।”

— जे. कृष्णमूर्ति

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