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विनोबा भावे — सूक्ति व विचार

विनोबा भावे के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। विनोबा भावे के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“अपने सुख में सुखी होने की और अपने दु:ख में दु:खी होने की तन्मयता कवि को हो, तो वह कवि नहीं बन सकता।”

— विनोबा भावे

“भाषा एक बात है और वाणी दूसरी। साहित्य का संबंध वाणी से आता है। मनुष्य की वाणी जितनी विकसित होगी, उतना उसका जीवन विकसित होगा। कुल जीवन का आधार वाणी है।”

— विनोबा भावे

“साहित्यशक्ति, शब्द-शक्ति मनुष्य तभी प्रकट कर सकता है, जब वह सामान्य मन से ऊपर उठकर जनता के मानस की तरफ़ देखे।”

— विनोबा भावे

“साहित्यिक द्रष्टा है। वह किसी रंग से रंगा हुआ नहीं रहता। वह किसी रंग से रंगा हुआ हो, तो सृष्टि को न्याय नहीं दे सकेगा।”

— विनोबा भावे

“जो संप्रदाय में बद्ध हैं, वे चिरंतन साहित्यिक नहीं होते हैं। वे तो तात्कालिक साहित्यिक होते हैं। चिरंतन साहित्यिक तो वे होते हैं, जो सब पंथ, संप्रदाय वग़ैरह से भिन्न होते हैं, परे होते हैं।”

— विनोबा भावे

“वाणी जिसका उच्चारण करती है, वह वाङ्मय है। उसमें कुत्ते का भुँकना भी आएगा। लेकिन जनता के पापों को जो शब्द धोएगा, वही सारस्वत होगा। पापों को धोनेवाला जो शब्द सरस्वती की कृपा से निकलेगा, वह वाग्विसर्ग सारस्वत है।”

— विनोबा भावे

“साहित्यिक में अनासक्ति नहीं होगी, तो वह दुनिया को नाप नहीं सकेगा। साहित्यिक को संसार के खेल में द्रष्टा होना चाहिए।”

— विनोबा भावे

“आज जो अच्छे हैं, उनमें बहुत थोड़े सच्चे अच्छे हैं। जो बुरे हैं, उनमें बहुत थोड़े सच्चे बुरे हैं। अच्छे लोग ज़्यादा हैं और बुरे कम हैं। अच्छे में सच्चे कम हैं और बुरे में सच्चे बहुत कम हैं। कुल मिलाकर सच्चे लोग बहुत कम हैं।”

— विनोबा भावे

“काव्य का स्वरूप लेखक की मर्ज़ी पर नहीं, रसिक की मर्ज़ी पर ही निर्भर रहता है।”

— विनोबा भावे

“विज्ञान-शक्ति, आत्मज्ञान-शक्ति, साहित्य-शक्ति—समाज को मोड़ देने में इन्हीं तीन शक्तियों से विशेष मदद मिलती है। इन्हीं की छाप समाज और व्यक्ति के हृदय पर पड़ती है।”

— विनोबा भावे

“महाकवि वह हो सकता है, जिसके हृदय में इतना काव्य भर गया है कि वह प्रकट ही नहीं कर सकता।”

— विनोबा भावे

“साहित्य में हृदय-प्रवेश करने की जो अप्रत्यक्ष शक्ति है, वह है मधुरता में, मार्दव में, अहिंसा में, नम्रता में और प्रत्यक्ष शक्ति है, सत्य में। सत्य और अहिंसा के बिना वाणी समर्थ साबित नहीं होगी।”

— विनोबा भावे

“विज्ञान, आत्मज्ञान और वाक्-शक्ति, मनुष्य का जीवन बदलती हैं। विज्ञान से स्थूल रूप बदल जाता है, और मन पर असर डालनेवाली परिस्थिति पैदा होती है।”

— विनोबा भावे

“साहित्यिक किसी संप्रदाय के नहीं होते। साहित्यिकों का लक्षण ही यह है कि वे संप्रदायातीत होते हैं।”

— विनोबा भावे

“कवि की इच्छा जो रहे, रसिक अपनी रुचि का अर्थ उस काव्य में से निकाल लेता है।”

— विनोबा भावे

“जो सहानुभूतिपूर्ण नहीं देखेगा, वह साहित्यिक नहीं हो सकता।”

— विनोबा भावे

“तृष्णा, क्रोध और भय—इन तीनों वृत्तियों के नष्ट हो जाने पर प्रज्ञा स्थिर होती है।”

— विनोबा भावे

“काव्य सत्य का प्रयोग है। जिसके जीवन में जितना सत्य उतरा होगा, उतना ही काव्य उसमें प्रकट होगा।”

— विनोबा भावे

“दीखने में जो होता है, प्रकट होता है; उससे न दीखने में जो होता है, वह बहुत बड़ा होता है। साहित्य दीखता नहीं। उसका जितना सूक्ष्म चिंतन करेंगे, उतना वह हमें व्यापक दर्शन देगा।”

— विनोबा भावे

“जिसे विश्वानुभूति हुई है और जो सर्वभूत हृदय होगा, जिसके मन में संकुचितता नहीं होगी—वही साहित्यिक होगा।”

— विनोबा भावे

“वाणी में सत्य रहेगा, तो उस वाणी का फल प्रत्यक्ष प्रकट होता है। जहाँ नहीं बोलना है, वहाँ मौन की शक्ति होनी चाहिए। ऐसी शक्ति नहीं होगी, तो वहाँ शब्द व्यर्थ जाएगा।”

— विनोबा भावे

“लोकजीवन पर असर डालनेवाली एक तीसरी शक्ति है, और वह है साहित्य की शक्ति। वह विज्ञान और आत्मज्ञान की शक्ति को जोड़नेवाली शक्ति है।”

— विनोबा भावे

“जो तटस्थ, निर्विकार होने पर भी, संसार में विचरने वाले सामान्यजनों के लिए अत्यंत प्रेम रखकर; चित्त में उनके लिए पक्षपात रखकर बरतेगा, वही सर्वोत्तम साहित्यिक होगा।”

— विनोबा भावे

“भारत की संस्कृति, वैश्वानर संस्कृति है। अर्थात् दुनिया में जितनी विविधता है, उतनी सब भारत में है।”

— विनोबा भावे

“परिस्थिति, काल और सामाजिक स्थिति पर अभिव्यक्ति निर्भर करती है।”

— विनोबा भावे

“निर्गुण-सगुण परस्पर पूरक हैं, परस्पर विरुद्ध नहीं। सगुण से निर्गुण तक की मंजिल तय करनी चाहिए और निर्गुण को भी चित्त के सूक्ष्म मल धोने के लिए, सगुण की आर्द्रता चाहिए।”

— विनोबा भावे

“लोकजीवन बदलना या उस पर स्थायी असर डालना—उन्हीं से बन सका; जिन्होंने या तो कुछ आध्यात्मिक खोज की थी, या कुछ वैज्ञानिक खोज।”

— विनोबा भावे

“पुरानी परंपरा का स्पर्श शक्ति प्रदान करता है, नया विचार माधुर्य उत्पन्न करता है।”

— विनोबा भावे

“सबके विचारों को परखने के लिए बुद्धि की तटस्थता, वाणी की निर्विकारता और अपने बारे में निरहंकारिता ज़रूरी है।”

— विनोबा भावे

“मरण को जीवन की विकृति मानने से दु:ख होता है।”

— विनोबा भावे

“साहित्य की शक्ति परमेश्वर की शक्ति के बराबर होती है।”

— विनोबा भावे

“जो सर्वजनों के लिए लभ्य होगी; सर्वजनों को स्पर्श कर सकेगी, वही श्रेष्ठ कला है।”

— विनोबा भावे

“जो केवल बुद्धि पर नहीं; हृदय पर अपनी कही हुई बातों का प्रभाव डालता है, उन्हें हृदय में पैठाता है—वही काव्य है, साहित्य है।”

— विनोबा भावे

“वाणी विज्ञान से भी आगे जाकर सीधी हृदय पर असर करती है और हृदय तक पहुँच जाती है। आत्मज्ञान अंदर प्रकाश डालता है। विज्ञान बाहर रहता है, आत्मज्ञान अंदर रहता है, और इन दोनों के बीच में रहकर वाणी पुल बनती है।”

— विनोबा भावे

“विचार का प्रकाशन वाणी से हो सकता है, लेकिन वाणी से भी गहरी चीज़ है—जीवन और आचरण। उसके ज़रिए भी विचार का प्रकाशन होता है।”

— विनोबा भावे

“जो प्रतिभावान साहित्यिक होता है, उसके ग्रंथ से नित्य नया अर्थ निकलता है।”

— विनोबा भावे

“जहाँ हम अपने को भूल जाते हैं और समष्टि में लीन हो जाते हैं, वहाँ आनंद हासिल होता है। वह समष्टि जितनी संकुचित होगी, उतना आनंद ही संकुचित होगा।”

— विनोबा भावे

“आकाश के समान अविरोधी, व्यापक और गति देने वाला होता है साहित्य।”

— विनोबा भावे

“जो शाश्वत साहित्यिक होता है, उसकी विश्वव्यापी प्रतिभा होती है।”

— विनोबा भावे

“कवि का चिंतन तो हमेशा अस्पष्ट होता है। उसके काव्य की गहराई को वह ख़ुद नहीं जानता।”

— विनोबा भावे

“जिसके जीवन में रस है, वह साहित्यिक है।”

— विनोबा भावे

“जो मनुष्य तौला हुआ शब्द बोलेगा, जिस शब्द में अतिशयोक्ति नहीं होगी, सत्य हो, मधुरता हो, फिर भी कार्य की शक्ति हो और बोलनेवाले का चित्त अक्षोभ हो, तो वह शब्द कारगर होगा।”

— विनोबा भावे

“जब तक बुद्धि आत्मनिष्ठ नहीं होती, तब तक स्वराज्य नहीं। अंदर से प्रकाश मिलेगा, तो स्वराज्य प्रकट होगा।”

— विनोबा भावे

“जिस समाज की वाणी दूषित होती है, उस समाज की उन्नति नहीं होती।”

— विनोबा भावे

“कवि जब महात्मा होते हैं, तब उनका असर जीवन पर पड़ता है।”

— विनोबा भावे

“साहित्यिक अगर किसी की पकड़ में आ जाए कि इसके फलाने-फलाने शब्द हैं, तो वह ख़त्म हुआ।”

— विनोबा भावे

“सब रंगों से अभिमुख होकर भी अलिप्त होना चाहिए। जो अलिप्त है, वह साहित्यिक होगा।”

— विनोबा भावे

“जिन्हें तालीम नहीं मिली है; ऐसे अपढ़ मनुष्य को जो अपना रस नहीं पहुँचा सकता, उसका ख़ुद का रस का झरना सूख गया है—ऐसा मैं तो मानता हूँ।”

— विनोबा भावे

“मुझे तो ऐसे साहित्यिकों का विशेष आकर्षण है, जो अपूर्ण होते हुए भी पूर्ण के साक्षात्कार के लिए प्रयत्नशील होते हैं।”

— विनोबा भावे

“सृष्टि और संसार से अलग होने की शक्ति जिसमें होगी, वह उत्तम साहित्यिक होगा।”

— विनोबा भावे

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