“हमेशा पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी से निराश रही है। नई पीढ़ी भी पुरानी पीढ़ी बनकर निराश होती रही है।”
— त्रिलोचन
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त्रिलोचन के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। त्रिलोचन के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।
“हमेशा पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी से निराश रही है। नई पीढ़ी भी पुरानी पीढ़ी बनकर निराश होती रही है।”
— त्रिलोचन
“कविता तो एक जीवन को तोड़कर सकल जीवन बनाती है। और जीवन टूटता है, वह कवि का है।”
— त्रिलोचन
“कोई कवि सहज और स्वस्थ रहे तो समझ लीजिए, कुछ क़सर है।”
— त्रिलोचन
“कविता अगर बनती जाएगी तो कवि नष्ट होता जाएगा।”
— त्रिलोचन
“शब्दों की शक्तियों का जितना ही अधिक बोध होगा अर्थबोध उतना ही सुगम्य होगा। इसके लिए पुरातन साहित्य का अनुशीलन तो करना ही चाहिए, समाज का व्यापक अनुभव भी प्राप्त करना चाहिए।”
— त्रिलोचन
“कवि जब पाठक की स्थिति में होता है, तब उसकी स्थिति रचना-काल से भिन्न होती है।”
— त्रिलोचन
“हिंदी का रचनाकार इतने-इतने बंधनों में जकड़ा हुआ है कि हम निर्बंध रचना की उम्मीद कर भी नहीं सकते।”
— त्रिलोचन
“समाज की गति के संचालन का कार्य जो शक्ति करती है, वह मुख्यतः प्रतिबंधक नियमों पर बल देती है।”
— त्रिलोचन
“प्रौढ़-वय का शासक अपने को वैसा ही क्रांतिकारी समझता रहता है, जैसा कभी युवावस्था में वह था।”
— त्रिलोचन
“व्यवस्था मनुष्य को नपुंसक बनाती है।”
— त्रिलोचन
“कवि में जिस प्रकार विधायक कल्पना की आवश्यकता है, उसी प्रकार पाठक में ग्राहक कल्पना की आवश्यकता होती है।”
— त्रिलोचन
“वर्तमान समाज अनेक आदर्शों का रंगमंच बन गया है।”
— त्रिलोचन
“जनभाषा पर कुछ भी कहने के पहले यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वह बहता नीर है। केवल सामाजिक संबंधों से ही उसे जाना और पहचाना जा सकता है और विवेकपूर्ण संतुलन से ही उसे काव्य का समर्थ माध्यम बनाया जा सकता है।”
— त्रिलोचन
“यदि मन में शिथिलता, श्रांति या शून्यता हो तो काव्यानुशीलन न करना चाहिए।”
— त्रिलोचन
“किसी भी प्रकार की संकीर्णता काव्य-सौंदर्य को अपहित कर लेती है।”
— त्रिलोचन
“अपनी रचना का पाठक बनकर कवि स्वयं तारतम्य की खोज करने लगता है।”
— त्रिलोचन
“चिंता और उद्विग्नता भी काव्य-सौंदर्य को परिच्छिन्न करती है।”
— त्रिलोचन
“किसी भी काव्य का अध्ययन करने से पहले आत्म-परीक्षा कर लेनी चाहिए।”
— त्रिलोचन
“किसी कवि के प्रति विशेष श्रद्धा दूसरे कवि का स्वरूप-बोध नहीं होने देती।”
— त्रिलोचन
“कभी-कभी विचार-विशेष से आग्रह से भी काव्य समझने में बाधा खड़ी होती है।”
— त्रिलोचन
“पाठक की ग्राहक कल्पना का विकास प्रत्यभिज्ञा के आश्रय से होता है। जिसकी निरीक्षण शक्ति जितनी विकसित होगी उसकी भावना का भी परिपाक तदनुकूल ही होगा।”
— त्रिलोचन
“ज्ञान, इच्छा और क्रिया जैसे और लोगों में है; वैसे ही रचनाकार और आलोचक में भी।”
— त्रिलोचन
“पूर्व-धारणाओं से काव्यार्थ-बोध में प्रायः बाधा उपस्थित होती है।”
— त्रिलोचन
“काव्य-पाठ करने के पहले मन को प्रत्येक बाहरी प्रभाव से मुक्त कर लेना चाहिए।”
— त्रिलोचन
“काव्यार्थ के लिए नियमित रूप से काव्य का पाठ और मनन करना चाहिए।”
— त्रिलोचन
“रचनाकार को पाठकों की आवश्यकता होती है, जिसके निर्माण में उसके समर्थक बराबर योग देते हैं। यह प्रलोभन उपेक्षणीय नहीं है।”
— त्रिलोचन
“भाषा समाज में समकालिकता की सीमाओं के भीतर समबोध द्वारा प्राप्त होती है।”
— त्रिलोचन
“हिंदी में कबीर अकेले ऐसे कवि हैं, जो अपने ही कथ्य के कारण महत्त्वपूर्ण हैं।”
— त्रिलोचन
“वस्तुतः आधुनिकता उस नए चरित्र को उभारती है जो समवर्ती जीवन में मिलता है।”
— त्रिलोचन
“लक्षक मन ही लक्षणीयता को परखकर उभारता है।”
— त्रिलोचन
“समाजिक उत्तरदायित्व आदर्श-भेद से अर्थ-भेद का व्यंजक पाया जाता है।”
— त्रिलोचन
“समवर्ती अनुभव अपनी अनंतता और व्यापकता में बाह्यतः लक्षणीय नहीं प्रतीत होते।”
— त्रिलोचन
“शब्दों का व्याकरण से भी ऊपर सामाजिक संदर्भ होता है, जिसका अनुसंधान हर रचनाकार को अलग-अलग करना पड़ता है।”
— त्रिलोचन
“समबोध ज्ञान या अनुभव की उस अवस्था में पुष्ट होता है जो प्रत्येक मन में कल्पना, सूझ या निश्चय के रूप में उदित होता है।”
— त्रिलोचन
“यदि मन पर किसी विशेष प्रकार के भावों अथवा विचारों के छाप पड़ चुकी हो तो भी काव्य का पाठ अनुपयुक्त है।”
— त्रिलोचन
“जब कोई अपनी समझ दूसरे को जताने की इच्छा करता है, तब आकार-इंगित-चेष्टा के बाद माध्यम उसका समर्थ सहायक बनता है; वह है भाषा।”
— त्रिलोचन
“धर्मनिरपेक्ष जिसे कह सकें ऐसा कोई आदमी नहीं है।”
— त्रिलोचन
“परख भी समकालिकता और समबोध से अनुशासित होती है।”
— त्रिलोचन
“कविता द्वारा पेश किया गया चित्र या चरित्र जिस क्षेत्र या वर्ग का होगा यदि उसका निरूपण यथातथ्य न हुआ तो कविता निराधार हो जाएगी।”
— त्रिलोचन
“आधुनिक हिंदी वह सामान्य भाषा है, जिसका समाज के अनेक स्तरों पर पार्थक्यविशिष्ट एक सर्वस्वीकृत व्यवस्था-विधान है।”
— त्रिलोचन