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प्रेमचंद — सूक्ति व विचार

प्रेमचंद के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। प्रेमचंद के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“पुरुष में थोड़ी-सी पशुता होती है, जिसे वह इरादा करके भी हटा नहीं सकता। वही पशुता उसे पुरुष बनाती है। विकास के क्रम में वह स्त्री से पीछे है। जिस दिन वह पूर्ण विकास को पहुँचेगा, वह भी स्त्री हो जाएगा।”

— प्रेमचंद

“धर्म का मुख्य स्तंभ भय है।”

— प्रेमचंद

“जो अपने घर में ही सुधार न कर सका हो, उसका दूसरों को सुधारने की चेष्टा करना बड़ी भारी धूर्तता है।”

— प्रेमचंद

“नारी केवल माता है, और इसके उपरांत वह जो कुछ है, वह सब मातृत्व का उपक्रम मात्र। मातृत्व संसार की सबसे बड़ी साधना, सबसे बड़ी तपस्या, सबसे बड़ा त्याग और सबसे महान विजय है। एक शब्द में उसे लय कहूँगा—जीवन के व्यक्तित्व का और नारीत्व का भी।”

— प्रेमचंद

“स्त्रियों की कोमलता पुरुषों की काव्य-कल्पना है।”

— प्रेमचंद

“अतीत चाहे दु:खद ही क्यों न हो, उसकी स्मृतियाँ मधुर होती हैं।”

— प्रेमचंद

“स्त्री और पुरुष में मैं वही प्रेम चाहता हूँ, जो दो स्वाधीन व्यक्तियों में होता है। वह प्रेम नहीं, जिसका आधार पराधीनता है।”

— प्रेमचंद

“आत्मा की हत्या करके अगर स्वर्ग भी मिले, तो वह नरक है।”

— प्रेमचंद

“प्रेम सीधी-सादी गऊ नहीं, ख़ूँख़ार शेर है, जो अपने शिकार पर किसी की आँख भी नहीं पड़ने देता।”

— प्रेमचंद

“पुरुष निर्दयी है, माना, लेकिन है तो इन्हीं माताओं का अंश, क्यों माता ने पुत्र को ऐसी शिक्षा नहीं दी कि वह माता या स्त्री-जाति की पूजा करता?”

— प्रेमचंद

“प्रेम जितना ही सच्चा, जितना ही हार्दिक होता है, उतना ही कोमल होता है। वह विपत्ति के सागर में उन्मत्त ग़ोते खा सकता है, पर अवहेलना की एक चोट भी सहन नहीं कर सकता।”

— प्रेमचंद

“साहित्य अपने काल का प्रतिबिम्ब होता है। जो भाव और विचार लोगों के हृदयों को स्पंदित करते हैं, वही साहित्य पर भी अपनी छाया डालते हैं।”

— प्रेमचंद

“क्रोध अत्यंत कठोर होता है। वह देखना चाहता है कि मेरा एक वाक्य निशाने पर बैठता है या नहीं, वह मौन को सहन नहीं कर सकता।”

— प्रेमचंद

“आदमी अकेला भी बहुत कुछ कर सकता है। अकेले आदमियों ने ही आदि से विचारों में क्रांति पैदा की है। अकेले आदमियों के कृत्यों से सारा इतिहास भरा पड़ा है।”

— प्रेमचंद

“ईर्ष्या से उन्मत स्त्री कुछ भी कर सकती है, उसकी आप शायद कल्पना भी नहीं कर सकते।”

— प्रेमचंद

“प्रेम जैसी निर्मम वस्तु क्या भय से बाँध कर रखी जा सकती है? वह तो पूरा विश्वास चाहती है, पूरी स्वाधीनता चाहती है, पूरी ज़िम्मेदारी चाहती है। उसके पल्लवित होने की शक्ति उसके अंदर है। उसे प्रकाश और क्षेत्र मिलना चाहिए। वह कोई दीवार नहीं है, जिस पर ऊपर से ईंटें रखी जाती है उसमें तो प्राण है, फैलने की असीम शक्ति है।”

— प्रेमचंद

“मक्कार आदमी को अपनी भावनाओं पर जो अधिकार होता है, वह किसी बड़े योगी के लिए भी कठिन है। उसका दिल रोता है मगर होंठ हँसते हैं, दिल ख़ुशियों से मज़े लेता है मगर आँखें रोती हैं, दिल डाह की आग से जलता है, मगर ज़ुबान से शहद और शक्कर की नदियाँ बहती हैं।”

— प्रेमचंद

“ख़ून का वह आख़िरी क़तरा जो वतन की हिफ़ाज़त में गिरे दुनिया की सबसे अनमोल चीज़ है।”

— प्रेमचंद

“कवि या साहित्यकार में अनुभूति की जितनी तीव्रता होती है, उसकी रचना उतनी ही आकर्षक और ऊँचे दर्ज की होती है।”

— प्रेमचंद

“पुरुष में नारी के गुण आ जाते हैं तो वह महात्मा बन जाता है, नारी में पुरुष के गुण आ जाते हैं, तो वह कुलटा हो जाती है।”

— प्रेमचंद

“मानव-प्रकृति को दवाब से कितनी घृणा है।”

— प्रेमचंद

“हिन्दुस्तान का उद्धार हिन्दुस्तान की जनता पर निर्भर है। जनता में अपनी योग्यता के अनुसार यह भाव पैदा करना प्रत्येक स्वदेशवासी का परम धर्म है।”

— प्रेमचंद

“हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो,जीवन की सचाइयों का प्रकाश हो, जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।”

— प्रेमचंद

“साहित्य की बहुत-सी परिभाषाएँ की गई हैं, पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा ‘जीवन की आलोचना’ है। चाहे वह निबन्ध के रूप में हो, चाहे कहानियों के, या काव्य के—उसे हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या करनी चाहिए।”

— प्रेमचंद

“अपमान को निगल जाना चरित्र-पतन की अंतिम सीमा है।”

— प्रेमचंद

“साहित्य उसी रचना को कहेंगे; जिसमें कोई सच्चाई प्रकट को गई हो, जिसकी भाषा प्रौढ़, परिमार्जित एवं सुंदर हो और जिसमें दिल और दिमाग़ पर असर डालने का गुण हो।”

— प्रेमचंद

“जिसे संसार दुःख कहता है, वही कवि के लिए सुख है।”

— प्रेमचंद

“कलाकार अपनी कला से सौंदर्य की सृष्टि करके परिस्थिति को विकास के उपयोगी बनाता है ।”

— प्रेमचंद

“सच्चा दानी प्रसिद्धि का अभिलाषी नहीं होता।”

— प्रेमचंद

“कोई मनुष्य, चाहे कितने ही दुःख में क्यों न हो, उस व्यक्ति के सामने अपना शोक प्रकट करना नहीं चाहता जिसे वह अपना सच्चा मित्र न समझता हो।”

— प्रेमचंद

“वफ़ा ही वह जादू है जो रूप के गर्व का सिर नीचा कर सकता है।”

— प्रेमचंद

“जो धर्म हमारी आत्मा का बंधन हो जाए, उससे जितनी जल्दी हम अपना गला छुड़ा लें उतना ही अच्छा है।”

— प्रेमचंद

“जिससे प्रेम हो गया, उससे द्वेष नहीं हो सकता, चाहे वह हमारे साथ कितना ही अन्याय क्यों न करे। जहाँ प्रेमिका प्रेमी के हाथों कत्ल हो, वहाँ समझ लीजिए कि प्रेम न था, केवल विषय-लालसा थी।”

— प्रेमचंद

“आशा निर्बलता से उत्पन्न होती है, पर उसके गर्भ से शक्ति का जन्म होता है।”

— प्रेमचंद

“धर्म का मूल तत्त्व आत्मा की एकता है। जो आदमी इस तत्त्व को नहीं समझता, वह वेदों और शास्त्रों का पंडित होने पर भी मूर्ख है; जो दुखियों के दुःख से दुःखी नहीं होता, जो अन्याय को देखकर उत्तेजित नहीं होता, जो समाज में ऊँच-नीच, पवित्र अपवित्र के भेद को बढ़ाता है, वह पंडित होकर भी मूर्ख है।”

— प्रेमचंद

“जीवन की दुर्घटनाओं में अक्सर बड़े महत्त्व के नैतिक पहलू छिपे हुआ करते हैं।”

— प्रेमचंद

“मुहब्बत रूह की खुराक है। यह वह अमृत की बूँद है जो मरे हुए भावों को ज़िंदा कर देती है। मुहब्बत 'आत्मिक वरदान है। यह ज़िंदगी की सबसे पाक, सबसे ऊँची, सबसे मुबारक बरकत है।”

— प्रेमचंद

“किसी को भी दूसरे के श्रम पर मोटे होने का अधिकार नहीं है। उपजीवी होना घोर लज्जा की बात है। कर्म करना प्राणी मात्र का धर्म है।”

— प्रेमचंद

“प्रकृति से अपने जीवन का सुर मिलाकर रहने में हमें इसीलिए आध्यात्मिक सुख मिलता है कि उससे हमारा जीवन विकसित और पुष्ट होता है।”

— प्रेमचंद

“धर्म ईश्वरीय कोप है, दैवीय वज्र है, जो मानव जाति के सर्वनाश के लिए अवतरित हुआ है।”

— प्रेमचंद

“साहित्य कलाकार के आध्यात्मिक सामंजस्य का व्यक्त रूप है, और सामंजस्य सौन्दर्य की सृष्टि करता है, नाश नहीं।”

— प्रेमचंद

“जहाँ सच्चा सौन्दर्य-प्रेम है, जहाँ प्रेम की प्रस्तुति है, वहाँ कमजोरियाँ कहाँ रह सकती हैं?”

— प्रेमचंद

“कठोर से कठोर हृदय में भी मातृस्नेह की कोमल पत्तियाँ संचित होती हैं।”

— प्रेमचंद

“जब साहित्य पर संसार की नश्वरता का रंग चढ़ा हो, और उसका एक-एक शब्द नैराश्य में डूबा हो, समय की प्रतिकूलता के रोने से भरा हो और श्रृंगारिक भावों का प्रतिबिम्ब बन गया हो, तो समझ लीजिये कि जाति जड़ता और ह्रास के पंजे में फंस चुकी है और उसमें उद्योग तथा संघर्ष का बल बाकी नहीं रहा; उसने ऊँचे लक्ष्यों की ओर से आँखें बन्द कर ली हैं, और उसमें से दुनिया को देखने-समझने की शक्ति लुप्त हो गई है।”

— प्रेमचंद

“गृहस्थी के संचय में, स्वार्थ की उपासना में, तो सारी दुनिया मरती है। परोपकार के लिए मरने का सौभाग्य तो संस्कार वालों को ही प्राप्त होता है।”

— प्रेमचंद

“क्रोध में आदमी अपने मन की बात नहीं करता, वह केवल दूसरे का दिल दुखाना चाहता है।”

— प्रेमचंद

“साहित्य हमारे जीवन को स्वाभाविक और स्वाधीन बनाता है।”

— प्रेमचंद

“स्त्रियों में बड़ा स्नेह होता है। पुरुषों की भांति उनकी मित्रता केवल पान-पत्ते तक ही समाप्त नहीं हो जाती।”

— प्रेमचंद

“जैसे ईख से रस निकाल लेने पर केवल सीठी रह जाती है, उसी प्रकार जिस मनुष्य के हृदय से प्रेम निकल गया, वह अस्थि चर्म का एक ढेर रह जाता है।”

— प्रेमचंद

“आशा मद है, निराशा मद का उतार। नशे में हम मैदान की तरफ़ दौड़ते हैं, सचेत होकर हम घर में विश्राम करते हैं। आशा जड़ की ओर ले जाती है, निराशा चैतन्य की ओर। आशा आँखें बंद कर देती है, निराशा आँखें खोल देती है। आशा सुलाने वाली थपकी है, निराशा जगाने वाला चाबुक।”

— प्रेमचंद

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