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जयशंकर प्रसाद — सूक्ति व विचार

जयशंकर प्रसाद के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“अन्य देश मनुष्यों की जन्मभूमि है, लेकिन भारत मानवता की जन्मभूमि है।”

— जयशंकर प्रसाद

“असंभव कहकर किसी काम को करने से पहले, कर्मक्षेत्र में काँपकर लड़खड़ाओ मत।”

— जयशंकर प्रसाद

“प्रेम महान है, प्रेम उदार है। प्रेमियों को भी वह उदार और महान बनाता है। प्रेम का मुख्य अर्थ है—‘आत्मत्याग’।”

— जयशंकर प्रसाद

“जीवन विश्व की संपत्ति है। प्रमाद से, क्षणिक आवेश से, या दुःख की कठिनाइयों से उसे नष्ट करना ठीक तो नहीं।”

— जयशंकर प्रसाद

“कोई समाज और धर्म स्त्रियों के नहीं। बहन! सब पुरुषों के हैं। सब हृदय को कुचलने वाले क्रूर हैं, फिर भी मैं समझती हूँ कि स्त्रियों का एक धर्म है, वह है आघात सहने की क्षमता रखना। दुर्देव के विधान ने उसके लिए यही पूर्णता बना दी है। यह उनकी रचना है।”

— जयशंकर प्रसाद

“परिवर्तन ही सृष्टि है, जीवन है। स्थिर होना मृत्यु है, निश्चेष्ट शांति मरण है।”

— जयशंकर प्रसाद

“ऐसा जीवन तो विडंबना है, जिसके लिए रात-दिन लड़ना पड़े!”

— जयशंकर प्रसाद

“पुरुषों के प्रति स्त्रियों का हृदय, प्रायः विषम और प्रतिकूल रहता है। जब लोग कहते हैं कि वे एक आँख से रोती हैं तो दूसरी से हँसती हैं, तब कोई भूल नहीं करते। हाँ, यह बात दूसरी है कि पुरुषों के इस विचार में व्यंग्यपूर्ण दृष्टिकोण का अंश है।”

— जयशंकर प्रसाद

“प्रत्येक जाति में मनुष्य को बाल्यकाल ही में एक धर्म-संघ का सदस्य बना देने की मूर्खतापूर्ण प्रथा चली आ रही है। जब उसमें जिज्ञासा नहीं, प्रेरणा नहीं, तब उसके धर्मग्रहण करने का क्या तात्पर्य हो सकता है?”

— जयशंकर प्रसाद

“इस भीषण संसार में एक प्रेम करने वाले हृदय को दबा देना सबसे बड़ी हानि है।”

— जयशंकर प्रसाद

“वही शरीर है, वही रूप है, वही हृदय है; पर छिन गया अधिकार और मनुष्य का मान-दंड ऐश्वर्य। अब तुलना में सबसे छोटी हूँ। जीवन लज्जा की रंगभूमि बन रहा है।”

— जयशंकर प्रसाद

“क्षमा पर केवल मनुष्य का अधिकार है, वह हमें पशु के पास नहीं मिलती।”

— जयशंकर प्रसाद

“सहनशील होना अच्छी बात है, पर अन्याय का विरोध करना उससे भी उत्तम है।”

— जयशंकर प्रसाद

“दूसरे की दया सब लोग खोजते हैं और स्वयं करनी पड़े कान पर हाथ रख लेते हैं।”

— जयशंकर प्रसाद

“एक दुर्भेद्य नारी-हृदय में विश्व-प्रहेलिका का रहस्यबीज है।”

— जयशंकर प्रसाद

“आह! तो इस विश्व में मेरा कोई सुहृद् नहीं है? मेरा संकल्प; अब मेरा आत्माभिमान ही मेरा मित्र है।”

— जयशंकर प्रसाद

“स्त्रियों का स्नेह-विश्वास भंग कर देना, कोमल तंतु को तोड़ने से भी सहज है, परंतु सहज होकर उसका परिणाम भी सोच लो।”

— जयशंकर प्रसाद

“दो प्यार करने वाले हृदयों के बीच में स्वर्गीय ज्योति का निवास होता है।”

— जयशंकर प्रसाद

“पढ़ाई सभी कामों में सुधार लाना सिखाती है।”

— जयशंकर प्रसाद

“प्रत्येक स्थान और समय बोलने योग्य नहीं रहते।”

— जयशंकर प्रसाद

“धर्म जब व्यापार हो गया और उसका कारबार चलने लगा, फिर तो उसमें हानि और लाभ दोनों होगा।”

— जयशंकर प्रसाद

“स्त्रियों का यह जन्मसिद्ध अधिकार है। मंगल! उसे खोजिना, परखना नहीं होता, कहीं से ले आना नहीं होता। वह बिखरा रहता है असावधानी से —धनकुबेर की विभूति के समान! उसे सम्हालकर केवल एक और व्यय करना पड़ता है।”

— जयशंकर प्रसाद

“स्त्री, जल-सदृश कोमल एवं अधिक से अधिक निरीह है। बाधा देने की सामर्थ्य नहीं, तब भी उसमें एक धारा है, एक गति है, पत्थरों की रुकावट की भी उपेक्षा करके कतराकर वह चली हो जाती है। अपनी संधि खोज ही लेती है, और सब उसके लिए पथ छोड़ देते हैं, सब झुकते हैं, सब लोहा मानते हैं।”

— जयशंकर प्रसाद

“समय बदलने पर लोगों की आँखें भी बदल जाती हैं।”

— जयशंकर प्रसाद

“निद्रा भी कैसी प्यारी वस्तु है। घोर दु:ख के समय भी मनुष्य को यही सुख देती है।”

— जयशंकर प्रसाद

“अधिक हर्ष और उन्नति के बाद ही अधिक दुःख और पतन की बारी आती है।”

— जयशंकर प्रसाद

“अंधकार का आलोक से, असत् का सत् से जड़ का चेतन से और बाह्य जगत का अंतर्जगत से संबंध कौन कराती है? कविता ही न।”

— जयशंकर प्रसाद

“स्त्रियों को उनकी आर्थिक पराधीनता के कारण जब हम स्नेह करने के लिए बाध्य करते हैं, तब उनके मन में विद्रोह की सृष्टि भी स्वाभाविक है!”

— जयशंकर प्रसाद

“अतीत सुखों के लिए सोच क्यों, अनागत भविष्य के लिए भय क्यों, और वर्तमान को मैं अपने अनुकूल बना ही लूँगा, फिर चिंता किस बात की?”

— जयशंकर प्रसाद

“जो अपने कर्मों को ईश्वर का कर्म समझकर करता है, वही ईश्वर का अवतार है।”

— जयशंकर प्रसाद

“पवित्रता की माप है मलिनता, सुख का आलोचक है दुःख, पुण्य की कसौटी है पाप।”

— जयशंकर प्रसाद

“दरिद्रता सब पापों की जननी है तथा लोभ उसकी सबसे बड़ी संतान है।”

— जयशंकर प्रसाद

“प्रेम यज्ञ में स्वार्थ और कामना का हवन करना होगा।”

— जयशंकर प्रसाद

“जीवन का प्राथमिक प्रसन्न उल्लास मनुष्य के भविष्य में मंगल और सौभाग्य को आमंत्रित करता है। उससे उदासीन न होना चाहिए।”

— जयशंकर प्रसाद

“उपासना बाह्य आवरण है उस विचार-निष्ठा का, जिसमें हमें विश्वास है। जिसकी दुःख-ज्वाला में मनुष्य व्याकुल हो जाता है, उस विश्व-चिता में मंगलमय नटराज के नृत्य का अनुकरण, आनंद की भावना, महाकाल की उपासना का बाह्य स्वरूप है और साथ ही कला की, सौंदर्य की अभिवृद्धि है, जिससे हम बाह्य में, विश्व में, सौंदर्य-भावना को सजीव रख सके हैं।”

— जयशंकर प्रसाद

“पुरुष है कुतूहल और प्रश्न; और स्त्री है विश्लेषण, उत्तर और सब बातों का समाधान।”

— जयशंकर प्रसाद

“आनंदमय आत्मा की उपलब्धि विकल्पात्मक विचारों और तर्कों से नहीं हो सकती।”

— जयशंकर प्रसाद

“मनुष्य के भीतर जो कुछ वास्तविक है, उसे छिपाने के लिए जब वह सभ्यता और शिष्टाचार का चोला पहनता है, तब उसे संभालने के लिए व्यस्त होकर कभी-कभी अपनी आँखों में ही उसको तुच्छ बनना पड़ता है।”

— जयशंकर प्रसाद

“ब्राह्मण न किसी के राज्य में रहता है और न किसी के अन्न से पलता है, स्वराज्य में विचरता है और अमृत होकर जीता है। वह तुम्हारा मिथ्या गर्व है। ब्राह्मण सब कुछ सामर्थ्य रखने पर भी, स्वेच्छा से इन माया-स्तूपों को ठुकरा देता है, प्रकृति के कल्याण के लिए अपने ज्ञान का दान देता है।”

— जयशंकर प्रसाद

“भगवान ने स्त्रियों को उत्पन्न करके ही अधिकारों से वंचित नहीं किया है। किंतु तुम लोगों की दस्युवृति ने उन्हें लूटा है।”

— जयशंकर प्रसाद

“नारी हृदय, जिसके मध्य-बिंदु से हट कर, शास्त्र का एक मंत्र, कील की तरह गड़ गया है और उसे अपने सरल प्रवर्तन-चक्र में घूमने से रोक रहा है।”

— जयशंकर प्रसाद

“मानव-जीवन लालसाओं से बना हुआ सुंदर चित्र है। उसका रंग छीनकर उसे रेखाचित्र बना देने से मुझे संतोष नहीं होगा।”

— जयशंकर प्रसाद

“स्त्री जिससे प्रेम करती है, उसी पर सर्वस्व वार देने को प्रस्तुत हो जाती है।”

— जयशंकर प्रसाद

“जब संस्कार और अनुकरण की आवश्यकता समाज में मान ली गई, तब हम परिस्थिति के अनुसार मानसिक परिवर्तन के लिए क्यों हिचकें? मेरा ऐसा विश्वास है कि प्रसन्नता से परिस्थिति को स्वीकार करके जीवन-यात्रा सरल बनाई जा सकती है।”

— जयशंकर प्रसाद

“जिसकी भुजाओं में दम न हो, उसके मस्तिष्क में तो कुछ होना ही चाहिए।”

— जयशंकर प्रसाद

“जो चूहे के शब्द से भी शंकित होते हैं, जो अपनी साँस से चौंक उठते हैं, उनके लिए उन्नति का कंटकित मार्ग नहीं है। महत्त्वाकांक्षा का दुर्गम स्वर्ग उनके लिए स्वप्न है।”

— जयशंकर प्रसाद

“संसार में छल, प्रवंचना और हत्याओं को देखकर कभी-कभी मान ही लेना पड़ता है कि यह जगत ही नरक है।”

— जयशंकर प्रसाद

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