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श्रीनरेश मेहता — सूक्ति व विचार

श्रीनरेश मेहता के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। श्रीनरेश मेहता के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“मनुष्य वह कोई हो; यही सोचता है कि परिवर्तन, बाधाएँ, अवरोध, पतन आदि सब दूसरों के लिए ही हैं।”

— श्रीनरेश मेहता

“व्यक्ति का मन भी अजीब है कि वह अस्वीकृति या निषेध की ओर ही भागता है।”

— श्रीनरेश मेहता

“दुःख उठाने वाला प्रायः टूट जाया करता है, परंतु दुःख का साक्षात् करने वाला निश्चय ही आत्मजयी होता है।”

— श्रीनरेश मेहता

“मनुष्य मात्र को इतिहास और राजनीति नहीं एक कविता चाहिए।”

— श्रीनरेश मेहता

“स्त्री और सब कुछ भूल सकती है, परंतु विवाह के तत्काल बाद जो उसे एकांत-व्यवहार पति के द्वारा मिलता हे वह अमिट होता है।”

— श्रीनरेश मेहता

“जो भी अपनी भूमि पर अँगूठे के बल खड़ा हो जाता है, वट-वृक्ष हो जाता है।”

— श्रीनरेश मेहता

“सच तो यह है कि समय अपने बीतने के लिए किसी की भी स्वीकृति की प्रतीक्षा नहीं करता।”

— श्रीनरेश मेहता

“देश-कालातीत इच्छाओं के वृत्तों की टकराहट ही है जो वस्तुतः पुरुषार्थों की स्फीति है।”

— श्रीनरेश मेहता

“अनंत के सापेक्ष में समय की संज्ञा, काल है तथा देश के सापेक्ष में काल की संज्ञा, समय है।”

— श्रीनरेश मेहता

“बिंदु की फैलती हुई वृत्तात्मकता ही परिधि है।”

— श्रीनरेश मेहता

“मनुष्य की रचना प्रकृति ने उसके ‘स्व’ के लिए की ही नहीं है।”

— श्रीनरेश मेहता

“पुरुष नहीं जानता कि उसके मनुष्य बने रहने में ज्ञात-अज्ञात रूप से स्त्री का कितना बड़ा हाथ होता है।”

— श्रीनरेश मेहता

“दुःख उठाना एक बात है और दुःख का साक्षात् करना सर्वथा भिन्न है।”

— श्रीनरेश मेहता

“पुरुषार्थ के बल पर जो लौकिकता अर्जित हुई रहती है, एक सीमा के बाद उसी में से वे कुतर्क जन्म लेने लगते हैं जो पुरुषार्थ को नगण्य करने लगते हैं।”

— श्रीनरेश मेहता

“सारे तत्त्व एक दूसरे को प्रति-प्रयुक्त भी करते हैं।”

— श्रीनरेश मेहता

“सामान्य जीवन में बहुत बुरा जिस प्रकार असहनीय होता है, उसी प्रकार बहुत अच्छा होना भी कष्टदायक ही होता है।”

— श्रीनरेश मेहता

“मृत्यु कोई बाहर से आई हुई सांघातिकता नहीं होती है, वह जन्म और जीवन की अविभाज्यता ही है।”

— श्रीनरेश मेहता

“प्रायः लोग रचना से आनंद नहीं, भोग की अपेक्षा करते हैं।”

— श्रीनरेश मेहता

“कोई नहीं जानता कि आदिम प्रकाश का वह प्रथम, बीज-ज्योति-कण या समय का वह प्रथम बीज-क्षण इतने गणनातीत वर्षों के बीत जाने पर भी महाज्रोति या महाकाल तक पहुँचा है कि नहीं।”

— श्रीनरेश मेहता

“एक संपूर्ण समाप्ति के पूर्व शताधिक खंडित समाप्तियाँ चलती रहती हैं।”

— श्रीनरेश मेहता

“स्त्री का नब्बे प्रतिशत प्रच्छन्न रहता है।”

— श्रीनरेश मेहता

“यह सापेक्ष समय जब बीतता है तो हमें वैसे ही तराशता चलता है जैसे कि जल अपनी मसृणता में भी, कैसी ही चट्टान क्यों न हो, शताब्दियों तक टकराते-टकराते अंततः ढहा कर रख देता है।”

— श्रीनरेश मेहता

“इस्लाम ने भारतीयता की स्थूलता को एक हज़ार वर्ष में छिन्न-भिन्न किया तो उसे ही सूक्ष्म स्तर पर पहले ईसाइयत ने और बाद में साम्यवादी-दर्शन ने गत पचास वर्षों में संपन्न किया।”

— श्रीनरेश मेहता

“भोगते हुए व्यक्ति की देह ही जिह्वा होती है।”

— श्रीनरेश मेहता

“हमारे प्रत्येक आचरण, कर्म या विचार केवल वृत्त का निर्माण ही करते हैं।”

— श्रीनरेश मेहता

“प्रत्येक वृत्त एक ऊँचाई की प्राप्ति के बाद अनिवार्यतः अपनी भूमि की ओर लौटने को बाध्य होता है।”

— श्रीनरेश मेहता

“किसी के लिए जीवन भर भाषा, मात्र गाली होती है तो किसी के लिए भाषा मंत्र होती है।”

— श्रीनरेश मेहता

“स्त्री के पार्श्व में पहुँचकर पुरुष सबसे निरीह होता है।”

— श्रीनरेश मेहता

“लेखक रचता है इसीलिए वह कथा-सृष्टा है, मात्र प्रस्तुत नहीं करता इसीलिए वह कथा-वाचक नहीं है।”

— श्रीनरेश मेहता

“उस परा-शून्य में आकार-प्रकार के सारे शून्य विलीन होकर केवल ‘महत्’ हो जाते हैं।”

— श्रीनरेश मेहता

“जीवन या यथार्थ को जब तक रचने का भाव लेखक में नहीं होगा, तब तक उस लिखने का कोई अर्थ ही नहीं है।”

— श्रीनरेश मेहता

“विवेक के कारण अनात्म होते ही आप ‘पुरुष’ हो जाते हैं और तब ‘इच्छा’ आपकी इच्छा पर निर्भर होने लगती है।”

— श्रीनरेश मेहता

“कैसा ही पथ क्यों न हो, उसका संबंध अनिवार्यतः मानव के साथ होता ही है।”

— श्रीनरेश मेहता

“कोई भी घटना सीमित ही होती है, परंतु उसकी आसन्नता अधिक भयावह लगती है।”

— श्रीनरेश मेहता

“समर्पण में निर्वस्त्रता एक मूल्य होती है।”

— श्रीनरेश मेहता

“सारे वृत्त एक-दूसरे को काटने के लिए ही जन्म लेते हैं।”

— श्रीनरेश मेहता

“प्रलय-पूर्व की देव-संस्कृति, क्यों और कैसे विनष्ट हुई इस आधारभूत एवं तात्विक समस्या को जब तक नहीं सुलझाया जाता, तब तक मनुष्यता और इतिहास के बारे में प्रतिपादित सारे आधुनिक सिद्धांत नितांत अवैज्ञानिक हैं।”

— श्रीनरेश मेहता

“अनात्म होने का अर्थ ही है ‘पुरुष’ होना। इच्छा या प्रकृति आपको माध्यम तभी तक बना सकती है जब तक आप ‘पुरुष’ नहीं हैं।”

— श्रीनरेश मेहता

“जब समय ही अपरिमेय है; तब काल और महाकाल क्या हैं, यह कोई नहीं जानता।”

— श्रीनरेश मेहता

“इच्छा, वृत्त को न केवल जन्म ही देती है बल्कि अग्रसर होते हुए विकास, फैलाव चाहती है; परंतु विवेक, वृत्त को समेटने के लिए कहता है ताकि अन्य के लिए प्रति-वृत्त न बने।”

— श्रीनरेश मेहता

“जो जितना ही संवेदनशील और संस्पर्शी व्यक्ति होता है, उसके लिए जीवन प्रत्यक्ष से अधिक अप्रत्यक्ष होता है।”

— श्रीनरेश मेहता

“घटना से अधिक से अधिक उसकी संभानाएँ मन को अधिक शंकालु बनाती है।”

— श्रीनरेश मेहता

“पतन, उत्थान की; मृत्यु, जीवन की एक मात्र सखा-छाया है।”

— श्रीनरेश मेहता

“...घटना का दर्द सीमित होने पर भी आसन्नता हमारे सारे व्यक्तित्व को निरंतर थरथराती होती है।”

— श्रीनरेश मेहता

“रचना का बड़प्पन उनके स्वत्व के बौनेपन के लिए चुनौती होता है, इसलिए जब भी उन्हें ऐसा कुछ दिखता-मिलता है; वे असुविधा अनुभव करते हैं।”

— श्रीनरेश मेहता

“सृष्टि है, निश्चित ही है; संरचना भी है : परंतु विनष्ट होने के लिए है।”

— श्रीनरेश मेहता

“ईसाइयत हमारे लिए अँग्रेज़ियत का ही पर्याय रही है।”

— श्रीनरेश मेहता

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