“अच्छे आदमी बनो—रोज़ मैं सोचता हूँ। क्या सोचकर अच्छा आदमी हुआ जा सकता है? अच्छा आदमी क्या होता है? कैसा होता है? किसकी तरह?”
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मंगलेश डबराल — सूक्ति व विचार
मंगलेश डबराल के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। मंगलेश डबराल के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।
“हिंदी अगर एक छोटी-सी भाषा होती, लोग उसे प्रेम और मनुष्यता के साथ बरतते तो उसका लेखक इतना अकेला नहीं होता।”
“हम इनसान हैं, मैं चाहता हूँ इस वाक्य की सचाई बची रहे।”
“जो नहीं हैं, मैं उनकी जगह लेना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ, वे मेरे मुँह से बोलें।”
“पेशेवर आलोचकों की त्रासदी शायद यहाँ से शुरू होती है कि वे प्राय: कविता के संवेदनशील पाठक नहीं होते।”
“कविता में कभी अच्छा मनुष्य दिख जाता है या कभी अच्छे मनुष्य में कविता दिख जाती है। कभी-कभी एक के भीतर दोनों ही दिख जाते हैं।”
“आधुनिकतावाद भले ही अलग-अलग टुकड़ों और बारीकियों में सफल रहा हो, सारत: वह विफल हो गया।”
“कभी-कभार मेरी कल्पना में ऐसी जगहें आती हैं जो दरअसल कहीं नहीं हैं या जिनके होने की सिर्फ़ संभावना है।”
“यात्रा करना जितना कठिन और रोमांचक है, यात्रा की कल्पना शायद उतनी ही सरल और सुखद है।”
“कवि को कविता के बाहर और भीतर दोनों जगह एक साथ रहने का जोखिम उठाना होता है।”
“संस्मरणों से किसी जगह को जानना उसे स्वप्न में जानने की तरह है जिसे हम जागने के कुछ देर बाद भूल जाते हैं या सिर्फ़ उसका मिटता हुआ स्वाद बचा रहता है।”
“मुझे अपनी कविताओं से भय होता है, जैसे मुझे घर जाते हुए भय होता है।”
“कहीं रास्ता भटक जाता हूँ तो घबराहट ज़रूर होती है, लेकिन यह भी लगता है कि अच्छा है इस रास्ते ने मुझे ठग लिया।”
“एक सरल वाक्य बचाना मेरा उद्देश्य है।”
“ख़ामोश होता हूँ तो वैसी कविता नहीं लिख सकता जैसी लिखना चाहता हूँ और बातूनी होने पर ख़राब आदमी होने का भय है।”
“मैं ऐसे छोटे-छोटे झूठ बोलता हूँ जिनसे दूसरों को कोई नुक़सान नहीं होता। लेकिन उनसे मेरा नुक़सान ज़रूर होता है।”
“मैं थोड़ा-सा कवि हूँ और आलोचक तो बिल्कुल नहीं हूँ।”
“बुख़ार की दुनिया भी बहुत अजीब है। वह यथार्थ से शुरू होती है और सीधे स्वप्न में चली जाती है।”
“मृतकों का अपना जीवन है जो शायद हम जीवितों से कहीं ज़्यादा सुंदर, उद्दात और मानवीय है।”
“एक प्रसिद्ध उक्ति है कि ‘अच्छे साहित्य’ का निर्धारण आलोचक करते हैं, लेकिन ‘महान साहित्य’ वही हो पाता है जिसे समाज स्वीकृत करता है।”
“ख़राब किया जा रहा मनुष्य आज जगह-जगह दिखाई देता है।”
“अतियथार्थ और अयथार्थ भी दरअसल यथार्थ हैं।”
“यथार्थ! यह संसार का सबसे कठिन शब्द है। करोड़ों जीवन यथार्थ को समझते-समझाते बीत गए।”
“कविता अपने समय के संकटों को पूरी सचाई से कभी व्यक्त नहीं कर पाती, इसलिए उसमें हमेशा ही संकट बना रहता है।”
“पूर्णकाम न हो सके लोगों का एक पूरा देश है जो हमारे संतुष्ट-सुरक्षित संसार को हिलाता रहता है।”