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महावीर प्रसाद द्विवेदी — सूक्ति व विचार

महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“जिस कवि में प्राकृतिक दृश्य और प्रकृति के कौशल देखने और समझने का जितना ही अधिक ज्ञान होता है, वह उतना ही बड़ा कवि भी होता है।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“अनुप्रास और यमक आदि शब्दाडंबर कविता के आधार नहीं, जो उनके न होने से कविता निर्जीव हो जाए, या उससे कोई अपरिमेय हानि पहुँचे। कविता का अच्छा या बुरा होना विशेषतः, अच्छे अर्थ और रस-बाहूल्य पर अवलंबित है।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“कवि का काम न तो शिक्षा देना है और न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से तो वह गान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“अर्थ-सौरम्य ही कविता का प्राण है। जिस पद्य में अर्थ का चमत्कार नहीं, वह कविता नहीं।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“ज्ञान की ऊर्जितावस्था में ही कला का सबसे अच्छा विकास होता है। हृदय के साथ मस्तिष्क की पुष्टि होने पर भावों की उत्तम अभिव्यक्ति होती है।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“सत्कविता की प्राप्ति बड़े पुण्य से होती है। हृदय में कवित्व-बीज होने ही से मनुष्य सत्कवि हो सकता है।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“जो कवि अच्छी शब्द-स्थापना करना नहीं जानता; अथवा यों कहिए कि जिसके पास काफ़ी शब्द-समूह नहीं है, उसे कविता करने का परिश्रम ही न करना चाहिए।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“एक मात्र सूनी शब्द-झंकार ही जिन कवियों की करामात हैं, उन्हें चाहिए कि वे एक दम ही बोलना बंद कर दें।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“कविता की भाषा बोलचाल से जितनी ही अधिक दूर जा पड़ती है, उतनी ही उसकी सादगी कम हो जाती है।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“हे जगदीश्वर, इस संसार में काले से भी काले कर्म करके जो लोग ललाट पर चंदन का सफ़ेद लेप लीपते हैं, उनकी भी गणना जब हम बड़े-बड़े धार्मिकों में की गई सुनाते हैं, तब हमारे मुँह से हँसी निकल ही जाती है।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“कविता के लिए उपज चाहिए। नए-नए भावों की उपज जिसके हृदय में नहीं, वह कभी अच्छी कविता नहीं लिख सकता।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“जिस भाषा के कवि अपनी कविता में बुरे शब्द और बुरे भाव भरते रहते हैं, उस भाषा की उन्नति तो होती नहीं, उल्टे अवनति होती जाती है।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“जिस समाज के लोग अपनी झूँठी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न होते हैं, वह समाज कभी प्रशंसनीय नहीं समझा जाता।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“मुहावरा ही भाषा का प्राण है; उसे जिसने नहीं जाना, उसने कुछ नहीं जाना। उसकी भाषा कदापि आदरणीय नहीं हो सकती।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“अलौकिक कार्य करनेवाले प्रतिभाशाली मनुष्य ही अवतार है। स्वाभाविक कवि भी एक प्रकार के अवतार हैं।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“कवि को ऐसी भाषा लिखनी चाहिए, जिसे सब कोई सहज में समझ ले और अर्थ को हृदयंगम कर सकें।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“कविता के बिगड़ने और उसकी सीमा परिमित हो जाने से साहित्य पर भारी आघात होता है।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“जिस तरह सड़क ज़रा भी ऊँची-नीची होने से बाइसिकल (पैरगाड़ी) के सवार को दचके लगते हैं, उसी तरह कविता की सड़क यदि थोड़ी भी नाहमवार हुई, तो पढ़ने वाले के हृदय पर धक्का लगे बिना नहीं रहता।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“कविता एक अपूर्व रसायन है। उसके रस की सिद्धि के लिए बड़ी सावधानी, बड़ी मनोयोगिता और बड़ी चतुराई आवश्यक होती है।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“कविता का सत्य दर्शन-शास्त्र या विज्ञान का सत्य नहीं है और न उसमें वह सत्य है, जो किसी धर्म अथवा मत विशेष से स्पष्ट किया जाता है। उसमें सत्य का प्रकाश कुछ दूसरी ही रीति से होता है।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊँचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए। केवल कविता ही के लिए कविता करना एक तमाशा है।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“कविता का लक्षण जहाँ कहीं भी पाया जाए, चाहे वह गद्य में ही चाहे पद्य—वहीं काव्य है।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“हे जगदीश, जो लोग कामिनी जनों की ओर घूरने ही के लिए देवालयों को सबेरे और सायंकाल जाते हैं, उन्हीं की सब कोई यदि प्रशंसा करे तो हाय! हाय! आस्तिकता अस्त हो गई समझनी चाहिए।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“ज्ञान कहीं भी मिलता हो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। परंतु अपनी ही भाषा और उसी के साहित्य को प्रधानता देना चाहिए, क्योंकि अपना, अपने देश का, अपनी जाति का उपकार और कल्याण अपनी ही भाषा के साहित्य की उन्नति से हो सकता है।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“कविता करने ही से कवि पदवी नहीं मिलती। कवि के हृदय को कवि के काव्य-कर्म को जो जान सकते हैं वे भी एक प्रकार के कवि हैं।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“स्वभाव, रुचि, अभ्यास, संगति, संप्रदाय और विवेक बुद्धि के न्यूनाधिक विकास के अनुसार सबको सब चीज़ें एक सी हृदयंगम नहीं होतीं।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“जिस कविता से जितना ही अधिक आनंद मिले, उसे उतना ही अधिक ऊँचे दरजे़ की समझना चाहिए।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

“प्रकृत कवि थोड़े ही परिश्रम और परिशीलन से अपनी कवित्व-शक्ति को विकसित कर सकता है। बना हुआ कवि बहुत परिश्रम और परिशीलन से भी, थोड़ा ही कवित्व-शक्ति प्राप्त कर सकता है।”

— महावीर प्रसाद द्विवेदी

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