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लीलाधर जगूड़ी — सूक्ति व विचार

लीलाधर जगूड़ी के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। लीलाधर जगूड़ी के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“भाषिक अभिव्यक्ति का रूप-रस, कविता द्वारा ही बचाया जा सकता है।”

— लीलाधर जगूड़ी

“बुराइयों को जाने बग़ैर, अच्छाइयों की पहचान और उनका पोषण संभव नहीं। कवि को गर्हित, निकृष्ट, वर्जित और निषिद्ध का भी पीछा करना चाहिए।”

— लीलाधर जगूड़ी

“ईश्वर जब हमारी भाषाएँ नहीं समझता तो हमारी प्रार्थनाएँ क्या समझता होगा? पर अगर ईश्वर इतनी सारी भाषाओं में कवियों की प्रार्थनाएँ समझता है, तो ईश्वर सबसे बड़ा अनुवादक है। उसका अनुवाद अनुभाग, सर्वाधिक संवेदनशील और सबसे एक साथ संवाद जारी रखने में सक्षम एवं सक्रिय है। हो सकता है उसका कोई प्रवक्ता आकर कहे कि ईश्वर पर नहीं, अपनी भाषा पर संदेह करो।”

— लीलाधर जगूड़ी

“मनुष्यता के मूलभूत गुण और मानवीय क्रूरताओं के समकालीन अत्याचारों के बीच, कोई भी एक तटस्थ लेखक हो ही नहीं सकता। लेखक कैमरा नहीं है, लेखक एक संवेदनशील आँख है, जिसके पास विचारधारा से पहले आँसुओं की धारा है। मुझे लगता है, मैं कवि होकर ख़ुद का ही शिकार कर रहा हूँ और ख़ुद अपने मनुष्य होने का शिकार हो रहा हूँ।”

— लीलाधर जगूड़ी

“नए विषयों की उद्‌भावना के लिए, किसी भी रचनाकार को हमेशा खुले मन और खुले दिमाग़ से संसार की हर चीज़ से मिलना चाहिए। सांसारिक यथार्थ और लौकिक परमार्थ के बिना कोई कवि नहीं हो सकता।”

— लीलाधर जगूड़ी

“बसंत के अंतरतम में, पतझर भी आवाज़ देता हुआ अपना आकार ले लेता है।”

— लीलाधर जगूड़ी

“कविता में इतिहास का होते हुए भी अपने समय का होना पड़ता है।”

— लीलाधर जगूड़ी

“कवि के पास अच्छे लोगों के अलावा, बुरे लोगों के बीच रहने के भी अच्छे-खासे अनुभव होने चाहिए।”

— लीलाधर जगूड़ी

“अगर मैं साहित्य के संपर्क में न आता, तो मैं संभवतः एक अपराधी हो जाता।”

— लीलाधर जगूड़ी

“साहित्य अच्छे आदमी का निर्माण संभवतः इसी तरह करता है कि वह अपने से जुड़ने वाले को अन्यायी, अपराधी और निरर्थक ईर्ष्याओं का पात्र नहीं बनने देता।”

— लीलाधर जगूड़ी

“कवि को दुश्चरित्रों, दुश्शीलों, पतितों, अटकों, भटकों और अपराधियों तक के प्रति, मानवीय ज़िम्मेदारी और करुणा से भरा हुआ होना चाहिए।”

— लीलाधर जगूड़ी

“रवि की तरह कवि को भी सब जगह बिना घृणा के जाने, रहने और सहने का तजुर्बा और साहस होना चाहिए। लाचारी और मजूबरीवश ऐसा होना कवि की अयोग्यता है। सोच-समझकर, जान-बूझकर, जिज्ञासु भाव से ऐसा हो, तो वह अपने कवि के निर्माण में बेहतर सहायक हो सकता है।”

— लीलाधर जगूड़ी

“किसी चीज़ की हताशा भी किसी चीज़ का अस्तित्व-बोध कराती है।”

— लीलाधर जगूड़ी

“मैं अनुभव और भाषा का आज़ाद ग़ुलाम हैं।”

— लीलाधर जगूड़ी

“ऑक्टेवियो पाज़ ने कहा है कि प्रत्येक पाठक एक दूसरा कवि है।”

— लीलाधर जगूड़ी

“अकेलापन साहित्य में व्यक्ति की मानसिक मरम्मत करता है।”

— लीलाधर जगूड़ी

“अच्छी कविता और अच्छे कवियों की सोहबत व्यक्तित्व में तब्दीलियाँ लाती है।”

— लीलाधर जगूड़ी

“इतिहास के लिए जो इतिहास में घुसे हुए रहते हैं, वे कविता क्षेत्र में अपने होने के इतिहास से वंचित हो जाते हैं। कहीं एक जगह जमा वर्तमान ही अतीत बन जाता है।”

— लीलाधर जगूड़ी

“कवि की संवेदना को अनुभवसिद्ध होना आवश्यक है, वरना बिना कीमत चुकाए मुफ़्त की कविताई यशस्वी नहीं हो सकती।”

— लीलाधर जगूड़ी

“अगला जन्म अगर होता है, तो मैं उसमें भी कवि होना चाहूँगा—सबसे बेहतर कवि। अन्यथा ख़ुद से तो बेहतर होना ही चाहूँगा।”

— लीलाधर जगूड़ी

“ज़िंदगी बहुत-सी चीज़ों के काम आती है, इसीलिए आत्महत्या के भी काम आई एक दिन—जैसे अपनी मृत्यु ही सारी चीज़ों पर अंतिम पर्दा हो।”

— लीलाधर जगूड़ी

“अपने को अपने कर्म में खोजो और उसी में प्रतिफल भी दिखेगा।”

— लीलाधर जगूड़ी

“प्रतिष्ठित और प्रचलित, दोनों के विरुद्ध अपना रास्ता निकालना—हर बार चुनौतियों भरा होता है।”

— लीलाधर जगूड़ी

“चीज़ें स्वभावतः सब अच्छी नहीं होतीं, उन्हें अच्छा बनाना पड़ता है। यह तभी संभव है, जब सबसे पहले अपनी ख़राबी और कमज़ोरी का बोध हो।”

— लीलाधर जगूड़ी

“मैं ख़ुद को भुला देने के लिए फिर एक नई कविता रचता हूँ, और फिर उससे आगे किसी और नई कविता की ओर बढ़ जाता हूँ। मैंने अब तक क्या-क्या सोचा, किया और लिखा—उसे याद रखता हूँ, पर दोहराता नहीं हूँ।”

— लीलाधर जगूड़ी

“साहित्य की जटिलता, ढाँचे और प्रभाव; दोनों स्तरों पर शुरू से ही मौजूद रही है, इसीलिए ख़ासकर कविता की समझदारी के लिए, अपने भीतर 'शीघ्र बोध' भी पैदा करने का ज्ञानात्मक अभ्यास विकसित करना पड़ता है। सरलीकरण और अतिरंजना से तभी छुटकारा पाया जा सकता है।”

— लीलाधर जगूड़ी

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