“स्त्री का हृदय सर्वत्र एक है; क्या पूर्व क्या पश्चिम, क्या देश क्या विदेश |”
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लक्ष्मीनारायण मिश्र — सूक्ति व विचार
लक्ष्मीनारायण मिश्र के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। लक्ष्मीनारायण मिश्र के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।
“स्त्री किसी भी अवस्था की क्यों न हो, प्रकृति से माता है और पुरुष किसी भी अवस्था का क्यों न हो, प्रकृति से बालक है।”
“अपने धर्म की चिंता मनुष्य नहीं करता किंतु दूसरों के लिए वह बराबर धर्म बनाता चलता है।”
“धर्म आकाश से नीचे नहीं उतरता, धरती से ऊपर उठता है।”
“धरती और नारी दोनों की बुरी गति होती है, निर्बल के साथ रहने में।”
“शस्त्र जहाँ हार जाता है, वहीं बुद्धि जीतती है।”
“जाति पुरुष की होती है... कन्या की देह पर जाति का अवलेप नहीं चढ़ता। भाग्य जिस पुरुष के साथ जा लगे... उसकी जाति उस पुरुष की हो जाती है।”
“अपराधी पर दया करने से लोकधर्म का नाश होता है।”
“देश की रक्षा राजा की सेना नहीं करती! देश की प्रजा करती है।”
“धर्म कोई व्यक्ति नहीं बना सकता, प्रकृति बनाती है धर्म और प्रकृति के कर्म को जो तोड़ता है, वह अनाचारी है, वस्त्र उसके चाहे किसी रंग में रंगे हों।”
“लोक की हँसी सहने वाले ही लोक का निर्माण करते हैं।”
“साहित्य और कला की हमारी पूरी परंपरा में, जीव की प्रधान कामना आनंद की अनुभूति है।”
“संसार के सारे कर्म इसके पार करने के सेतु हैं। देखने में एक कर्म दूसरे से भिन्न है पर उन सब के मिलने से ही वह सेतु बनता है जो संसार के पार लगाता है।”
“यश, पुण्य और प्रेम से सिर का झुकना ही धर्म है।”
“इस सृष्टि का सत्य तर्क नहीं कर्म है, सत्य और धर्म दोनों ही का बहाव कर्म की उपत्यका के भीतर ही मिल सकता है।”
“केवल कान में मंत्र देना गुरु का काम नहीं है।संकट से रक्षा करना शिष्य के कर्म को गति देना भी गुरु का काम है।”
“नारी शक्ति से ही पुरुष को विजय मिलती है और फिर जहाँ माता की प्रेरणा काम करे, वहाँ असाध्य और असंभव कुछ भी नहीं है।”
“न्याय तो होता है वास्तव में मनुष्य के हृदय में, और विचारक का काम करती है उसकी आत्मा।”
“नियति तो क्षमा नहीं करती, उसका विधान तो दंड है।”
“उत्थान के भीतर से पतन का विष बराबर निकला है।”
“भेद का परिचय विद्या से नहीं है, उसका जन्म तो अविद्या की भूमि में होता है।”
“चार पुरुषार्थ के चित्रण में जीवन की नानाविधि परिस्थितियों का अनुभव नवरस के रूप में कवि का लक्ष्य रहा है।”
“दुर्लभ रत्न के लिए समुद्र की तलहटी में जाना पड़ता है।”
“काल नहीं बीतता इस देह की आयु भर बीतती है।”
“कवि व्यक्ति नहीं, विधाता है और उसका धर्म जीवधर्म का साक्षात्कार तथा सृष्टि-दर्शन है। और यही धर्म भारतीय साहित्य, संगीत, चित्र और मूर्ति-निर्माण में सब कहीं बिना किसी प्रकार के श्रम के देखा जा सकता है। कवि ने अपने कवि-कर्म का नाम 'रामायण' रखा पर 'राम' नहीं। व्यक्ति के नाम पर साहित्यित कृतियों का नामकरण नहीं हुआ।”
“उत्तेजना में विचार मंद हो जाता है।”
“गंगा की पवित्रता में कोई विश्वास नहीं करने जाता। गंगा के निकट पहुँच जाने पर अनायास, वह विश्वास पता नहीं कहाँ से आ जाता है।”
“अपने घर के अंधकार में दूसरे का प्रकाश असह्य हो उठता है।”
“सभ्यता और संस्कार जीवन को नीरस बनाने का काम करते हैं।”
“लोक-जीवन से विमुख होकर निर्वाण की कामना विडंबना है।”
“त्याग में ही जीवन है—जो त्याग नहीं कर सकता, उसे जीने का अधिकार नहीं।”
“कामना न रहे तो फिर यह संसार न रहे।”
“लोकनिंदा भी कभी राजदंड से दबती है? दबाने पर तो ज्वालामुखी की तरह उसका विस्फोट होता है।”
“हर ध्वंस में निर्माण के और हर प्रलय में सृष्टि के बीज पड़ते हैं।”
“निर्माण में ही मनुष्य अमर है।”
“निश्चिंत हो जाने का अर्थ होता है असावधान हो जाना।”
“चित्त की सभी कामनाएँ आशीर्वाद में समा जाती हैं।”
“प्रकृति कभी-कभी रोने के लिए भी विवश करती है।”
“जहाँ बुद्धि काम नहीं करती...पौरुष थक जाता है, वहाँ अंत में होनहार की आड़ ही काम देती है।”
“मानसिक व्यभिचार शारीरिक व्यभिचार से भी भयंकर है।”
“राष्ट्र की रक्षा कोरे शास्त्र से नहीं हो सकती। शस्त्र रक्षित राष्ट्र में ही शास्त्र जन्म लेता है।”