विचारघर

विचारघर › हिंदी साहित्यकार व कवि › कृष्ण बलदेव वैद

कृष्ण बलदेव वैद — सूक्ति व विचार

कृष्ण बलदेव वैद के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। कृष्ण बलदेव वैद के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।

“उपन्यास और कहानी की अपेक्षा नाटक मुझे कम कठिन विधा लगती है।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“अगर इनसान पैसे और शोहरत का मोह छोड़ दे तो वह ख़तरनाक हो जाता है, कोई उसे बरदाश्त नहीं कर पाता, सब उससे दूर भागते हैं, या उसे पैसा और शोहरत देकर फिर मोह के जाल में फाँस लेना चाहते हैं।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“पीते वक़्त ख़्वाहिश होती है अच्छा संगीत सुनूँ, और संगीत के इर्द-गिर्द ख़ामोशी हो।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“पुराने दोस्त पी लेने के बाद और पराए हो जाते हैं। पी लेने के बाद दोस्तों की ज़बान खुल जाती है, दिल नहीं।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“अगर इस दुनिया को ईश्वर का ख़्वाब समझ लिए जाए तो ईश्वर से अपेक्षा कम हो जाए, हमदर्दी ज़्यादा।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“पीते वक़्त भी निपट अकेला होता हूँ, लिखते वक़्त भी।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“हर वक़्त रिश्तेदारों और बच्चों के लिए तड़पने वाले बूढ़े सुखी नहीं होते।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“महफ़िल में पीना दूसरे दर्जे का पीना है, महफ़िल के लिए लिखना दूसरे दर्जे का लिखना।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“पीते वक़्त अगर लिखने की-सी कैफ़ियत पैदा हो जाए तो पीना सिर्फ़ पीना नहीं रहता।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“अचानक उसने कहा—बताओ तो तुमने जीवन से क्या दानाई हासिल की? मैंने कहा—मेरा सारा लेखन संशय केंद्रित है।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“डायरी में भी सब कुछ दर्ज नहीं किया जाता। उस डायरी में भी नहीं जो छपवाई नहीं जानी है। मतलब यह कि ख़ुफ़िया डायरी पर भी यह ख़ौफ़ हावी रहता है कि कोई मुझे पढ़ लेगा।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“बदसूरती आम हिंदुस्तानी आँख को दिखाई ही नहीं देती।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“अंत का इंतज़ार ही नहीं करना चाहिए, उसका इंतज़ाम भी करना चाहिए।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“यह कड़वी हक़ीक़त कि हम हिंदी के लेखक एक-दूसरे को शौक़, प्यार और उदारता से नहीं पढ़ते। अक्सर तो पढ़ते ही नहीं। पढ़ भी लें तो बता नहीं देते कि पढ़ लिया है।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“यादों को भी पानी की ज़रूरत होती है—आँसुओं के पानी की।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“चेहरा दिखाने की ख़्वाहिश? चेहरे देखने की ख़्वाहिश? ग़लत ख़्वाहिश।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“लिखते वक़्त अगर बग़ैर पिए पीने का-सा सरूर आ जाए तो लिखने में भी पीने की-सी कैफ़ियत पैदा हो जाती है।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“ज़िंदगी का राज़ या अर्थ तो शायद ही हाथ लगे, फूलों और पत्तों और परिंदों से ही प्यार करते रहना चाहिए।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“मंच का मोह मुझे नहीं, भय है। इस भय ने मुझे कई प्रलोभनों से बचाया है।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“जीते जी मर जाने को यह मतलब नहीं कि आप कोई हरकत ही न करें या किसी भी हरकत पर हैरान या परेशान न हों।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“कड़वाहट का गोला जब गले में पिघलता है तो आँखों में आँसुओं की चुभन शुरू हो जाती है।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“मैं पैदाइशी ‘अछूत’ हूँ। मुझे किसी संस्था में कोई आस्था नहीं। बकवास और ख़ुराफ़ात मुझसे बरदाश्त नहीं होते। स्याह को सफ़ेद या भूरा मैं नहीं कह सकता। खेल मैं नहीं खेलता।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“मैं पैसे और शोहरत के मोह से मुक्त होने की कोशिश में हूँ, इसीलिए बहुत से लोग मुझसे दूर भागते रहते हैं।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“मौत में ही मुक्ति है। जीवनमुक्त लोगों से ईर्ष्या होती है, मैं उन लोगों में नहीं हो सकता क्योंकि मैं लेखक हूँ।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“हर शाम अपने मन को साफ़ करता हूँ, ताकि अगली सुबह साफ़ मन से लिख सकूँ।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“अहं से आज़ादी आसान तो नहीं, लेकिन बतौर आदर्श यह ज़रूरी है।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“ग़ुरबत और ग़लाज़त दो बहनें : दुनिया भर में।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“बुढ़ापे में ख़ामोशी किसी-किसी को ही नसीब होती है।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“साहित्य अकादेमी का माहौल मुझे हमेशा असाहित्यिक लगा है।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“मेरा काम हमेशा नासाज़ हालात में ही हुआ है, साज़गार हालात में नहीं।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“पीता ज़्यादा नहीं। ज़्यादा पी ही नहीं सकता।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“हिंदुस्तानी डाकख़ाना एक डरावनी जगह है। उस माहौल में काम करने वाले बाबू पागल क्यों नहीं हो जाते?”

— कृष्ण बलदेव वैद

“नशा उतर जाने के बाद हदें फिर हावी हो जाती हैं। लेकिन क्षणिक या अस्थायी ‘बेहदी’ भी बुरी नहीं होती।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“मरने से पहले सबको मुआफ़ कर देना चाहिए, सब से मुआफ़ी माँग लेनी चाहिए, ख़ुद को भी मुआफ़ कर देना चाहिए। मरने से पहले मुराद मरने से दो मिनट पहले नहीं।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“दुख गहराई और शांति देता है, मरने में मदद करता है, हलीमी सिखाता है, सुख का सतहीपन सामने लाता है। मुझे दुख का शुक्रगुज़ार होना चाहिए।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“अनासक्ति और संवेदनशून्यता में भी फ़र्क़ है।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“प्रार्थना अपनी लाचारी के इक़बाल का दूसरा नाम।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“अपने बीवी-बच्चों से, दोस्तों से, कोई अपेक्षा नहीं होनी चाहिए, अपने आपसे भी।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“अपने अहं को मार देने और अपने आत्मसम्मान को मार देने में फ़र्क़ है।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“ख़्वाहिशें ख़त्म नहीं होती। वे हो भी जाएँ, ख़्वाहिश ख़त्म नहीं होती।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“बच्चों के साथ रहते हुए तन थक जाता है, मन मौज में रहता है; काम की चिंता के बावजूद। कभी-कभी मन भी मैला हो जाता है।”

— कृष्ण बलदेव वैद

“जो याद रह जाता है वही शायद रखने के क़ाबिल होता है।”

— कृष्ण बलदेव वैद

हिंदी साहित्यकार व कवि के अन्य रचनाकार