“भावजगत की वस्तु को आकार देने का प्रयास—ऐसा आकार देने का प्रयास; जिससे कि वह भाव अधिक से अधिक संप्रेष्य बन सके और अन्य चित्रों में भी वैसी ही दीप्ति या द्युति उत्पन्न कर सके—कलाकार का लक्ष्य होता है।”
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देवीशंकर अवस्थी — सूक्ति व विचार
देवीशंकर अवस्थी के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। देवीशंकर अवस्थी के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।
“कोई कृति अपने आप में एकांत सत्य नहीं होती है, वह अपने समय तक की परंपरा की अंतिम कड़ी भी होती है।”
“जन-मन की गाए बिना साहित्य में शाश्वत होने की क्षमता नहीं।”
“कविता के लिए चित्रभाषा की आवश्यकता पड़ती है। उसके शब्द सस्वर होने चाहिए, जो बोलते हों सेब की तरह—जिनके रस की मधुर लालिमा भीतर न समा सकने के कारण बाहर झलक पड़े।”
“मानव की प्रवृत्ति आनंद एवं सौंदर्योंमुखी है।”
“कोई भी कृति नितांत वैयक्तिक नहीं होती; वह अपनी परंपरा की उस युग तक की अंतिम कृति होती है, जिससे कि नई परंपरा का नैरंतर्य भी क्षरित हो सकता है।”
“वास्तव में श्रेष्ठ साहित्य की रचना, परंपरा के भीतर युग के यथार्थ को समेट कर होती है।”
“शिशु की नग्नावस्था जिस प्रकार पावनता का अतिक्रमण नहीं करती, उस प्रकार कलाकार की सौंदर्य सृष्टि भी सत्य और पवित्र होती है।”
“अनुभूति ही कला का मूल बीज है। अनुभूति के भी मूल में मानव की सौंदर्यखोजी प्रवृत्ति है, इसीलिए कला की दृष्टि सौंदर्य-विधायिनी है।”
“कलाकार वस्तु को खंड-खंड करके नहीं देखता, उसे वह संपूर्ण रूप में ही चित्रित करता है।”
“कला की सबसे बड़ी उपयोगिता है—कर्म कोलाहलमय जीवन को सबल, सरस एवं प्राणवान बनाना।”
“कला में एकांगिता न होनी चाहिए। यदि एक ओर कला का सृजन कला की वृद्धि के लिए; उसके विकास के लिए हो, तो दूसरी ओर उसका सृजन जीवन को सबल एवं विकसित करने के लिए भी हो।”
“आनंद का जन्मदाता है रस, रस की सृष्टि करती है 'कला'।”
“सभ्य और सुसंस्कृत व्यक्ति के लिए ज्ञान का छोटा अणु भी उपयोगी एवं आवश्यक होता है।”
“वास्तविक कला कभी अशिव नहीं होती। वह तो व्यक्ति के सत् पक्ष एवं दुर्बल असत् पक्ष दोनों को उपस्थित करती है।”
“रचनाशीलता के लिए एक चुनौती होनी चाहिए और वैचारिक संघर्ष, हर रचनाकार को अपने स्तर पर उद्बुद्ध करता है।”
“वास्तव में कृतिकार के प्रेष्य अनुभव का मात्र भावन करना; पर उसकी परीक्षा न करना—जीवन में अंधभाव से चलना ही नहीं है, पीछे भी लौटना है।”
“आधुनिक कलाकार मात्र परंपरा के प्रसंग में ही आधुनिक होगा—पुराने से भिन्न हो जाने के अर्थ में।”
“अगर भारतीयता को आधुनिकता के विरोध में खड़ा कर दिया जाएगा; तो बहस के नुक़्तों में बल का आग्रह बदल जाएगा और विपथगा बन जाने की पूरी संभावना रहेगी। भारतीयता माने प्राचीनतावाद नहीं ही है।”
“आज भी कविता और गद्य की भाषा का अंतर भावावेश की भाषा का अंत है।”
“कविता तुलना से बनती है।”
“समकालीनता-बोध से रहित आलोचना को आलोचना नहीं कहा जा सकता—शोध, पांडित्य या कुछ और भले ही कह दिया जाए।”
“ख्याति न मिलने की कुंठा भीतर-भीतर विरोधी बना देती है।”
“कला की आत्मा है सौंदर्यानुभूति।”
“वास्तविक कला कभी अशिव नहीं होती।”
“जीनियस की प्रशंसा नहीं होती। या तो उसकी निंदा होती है या फिर applause होता है। प्रशंसा (Praise) सदैव ‘मीडियाकर’ की होती है। मसलन यह बहुत अच्छा पढ़ाता है, या उसका स्वभाव बहुत अच्छा है या वह बड़ा सज्जन है। ये सारे शब्द और विशेषण ‘मीडियाकर’ के पर्याय हैं।”
“अनुभूति की अभिव्यक्ति ही कला का रूप धारण करती है।”
“युग चेतना की अभिव्यक्ति के लिए अपना एक छंद चाहिए।”
“कला का मूल उत्स आनंद है।”
“कला न सुनीतिमूलक है और न दुर्नीतिमूलक।”
“कला-सृष्टि जीवन की सार्थकता है। जीवन से उसे अलग देखना अपराध है।”
“जीवन की व्याख्या ही नहीं करनी पड़ती है, बल्कि जीवित रहने की प्रक्रिया भी खोजनी पड़ती है।”
“कला मनुष्यत्व का चरम उत्कर्ष है।”
“जो चिरंतन है, वही ग्राह्य है।”
“आलोचना का प्राथमिक दायित्व नवलेखन के प्रति ही है।”
“वास्तव में श्रेष्ठ साहित्य की रचना परंपरा के भीतर युग के यथार्थ को समेट लेती है।”
“जब एक सही पंक्ति बन जाती है तो उसमें परिवर्तन संभव नहीं।”
“शाश्वत सत्य का समावेश ही काव्य और कला को स्थायित्व प्रदान करता है।”