“जितने दिन तक मनुष्य कर्मकांड और सांप्रदायिक ज्ञान से मुक्त नहीं होता, उतने दिन तक वह सर्वमानव के उपयुक्त नहीं होता।”
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आचार्य क्षितिमोहन सेन — सूक्ति व विचार
आचार्य क्षितिमोहन सेन के प्रेरित करने वाले विचार, सूक्तियाँ और उद्धरण — हिंदी में। आचार्य क्षितिमोहन सेन के प्रसिद्ध विचार पढ़ें और उन्हें तस्वीर बनाकर WhatsApp, Facebook या Instagram पर साझा करें।
“प्रेम-मिलन में वर और कन्या दोनों ही परस्पर के पूरक हैं। तुलना की तो वहाँ पर बात ही नहीं उठती, वहाँ दोनों ही—'वागर्थाविव सम्स्पृक्तौ—वाणी और अर्थ की तरह मिले हुए हैं।”
“संसार में सांप्रदायिक सत्य, दलगत सत्य प्रभृति नाना प्रकार के संकीर्ण सत्य नामक सत्य नहीं है। सर्वसत्य का एकमात्र परख है—उसकी सार्वभौमिकता।”
“जिस प्रकार गंगा की धारा को पर्वत-प्रदेशीय, या उत्तरप्रदेशीय या बिहारी, या बंगाली कहना निरर्थक है, उसी प्रकार सत्य, धर्म और संस्कृति प्रभृति महासंपद् भी अविच्छेद्य और सीमातीत है।”
“अंतर में जो ऐक्य है, जो योग है, उसमें ही परमानंद है। इसको प्राप्त करना ही यथार्थ ज्ञान है।”
“संप्रदाय-विशेष-पूजित काठ-पत्थरों के प्रतीक और उसकी पूजा या आचार-संस्कार, मनुष्य में मनुष्य को सदा ही विच्छिन्न रखते हैं। इसीलिए अपने अंतर में सत्य-स्वरूप और प्रेम-स्वरूप 'एक' को उपलब्ध करने के सिवा, मिलन का और क्या उपाए हो सकता है?”
“सहज के भीतर ही मनुष्य का मिलन है। शाश्वत और शांत सत्य के भीतर ही सर्वमानव का सदा भरोसा है।”
“परस्पर को अगर हम न जानें, तभी हमारा सर्वनाश उपस्थित होता है।”
“जो लोग सनातन वर्जनशीलता पर अभिमान किया करते हैं, उन्हें याद दिला देना चाहता हूँ कि विष्णु ही हमारे परम देवता हैं, विष्णु का अर्थ ही है व्यापक, जो सर्वत्र व्याप्त हैं।उन्हीं विष्णु के सेवक वैष्णव होकर भी; हम यदि अपने को क्षुद्र सीमाओं में बंद कर रखना चाहें, तो यह बात निश्चय ही अवैष्णवजनोचित आचरण होगी।”
“जो बात सहज है; उसमें विक्षोभ नहीं है, प्रयास नहीं है, श्रांति भी नहीं है। वह 'परम विश्राम' है।”
“उदारता ही साधना का एक धन और भगवान् की दी हुई महासंपद् है।”
“काया और स्थूल के अतीत धाम में जहाँ जीव जाता है, वहीं वह 'सहज' समाहित है।”
“हमारे देश के जातिभेद की दीवार ही धर्म पर खड़ी हुई है। इस भेद के मूल में ही धर्म है।”
“सत्य का विनाश नहीं होता। बीज जिस प्रकार सौ-सौ वर्षों तक समय, क्षेत्र और सुयोग के अभाव से सुप्त शक्ति होकर प्रतीक्षा करता है, सत्य भी उसी प्रकार सैकड़ों वर्षों तक प्रतीक्षा कर सकता है।”
“वर्जनशील राजनीति अधिक दिनों तक मानव जाति की रक्षा नहीं कर सकती।”
“अनुभव के अनिर्वचनीय भाव से अनिवर्चनीय संगति की सृष्टि होती है। भाषा वहाँ हार जाती है।”
“ज्ञान की अपेक्षा अनुभव (realization) अधिक गंभीर बात है।”
“दूसरे को ग्रास बनाकर स्फ़ीत होने की प्रथा भारतीय नहीं है।”
“लोग दूसरे की दुर्गति समझ सकते हैं, किंतु अपनी नहीं समझ पाते।”
“सत्य की साधना में पराजित, आत्म-सम्मानहीन क्षुद्र प्राणों को कोई स्थान ही नहीं।”
“धर्म की साधना में सहज का महत्त्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि साधना के सहज (स्वाभाविक) होने की अपेक्षा और कौन-सा बड़ा लक्ष्य हो सकता है?”
“जब कोई एक विराट भाव-धारा एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश पर बह चलती है, तब वह धारा ही सर्वप्रदेशों में योग-ऐक्य के सूत्र का काम करती है।”
“आत्मा में ऐक्यबोध की उपलब्धि होने पर ही संसार में समदृष्टि घटती है।”
“राजनीति में जिस मिलन की बात सुनाई देती है, वह साही के आलिंगन-जैसा है। कोई किसी के पास आने की हिम्मत नही करता है। सभी सबको कदर्य भाव से ग्रास बनाना चाहते हैं।”
“जिस दिन से हिंदू समाज में विधि-निषेध की दीवारें कठोर बना दी गईं, उसी दिन से उसमें एक प्रकार की गतिहीन जड़ता आ गई है।”
“जीवन का धर्म ही है, पद-पद पर अभिनव-भाव और प्रत्येक मनुष्य में वैचित्र्य।”
“अपने संबंध में 'अतिचेत' (over conscious) होना ही न होने का लक्षण है। सहज-पंथ के पथिक का लक्षण ही है—अपने विषय में अचेत रहना।”